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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

Page 215 of 675

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Page 215

२१४ * गीता-संग्रह *


न चापि मन्यसे राजन्नेष दोषः प्रसङ्गतः।
उद्योगादेव धर्मज्ञाः कालेनैव गमिष्यथ ॥ ७॥
तुम जो ऐसा मानते हो कि ऐश्वर्य दोषकारक होता है, क्योंकि वह आसक्तिका हेतु होनेके कारण मोक्षका प्रतिबन्धक है तो तुम्हारी यह मान्यता ठीक नहीं है; क्योंकि तुम सब लोग धर्मके ज्ञाता हो। स्वयं ही उद्योग करके शम, दम आदि साधनोंद्वारा कुछ ही कालमें मोक्ष प्राप्त कर सकते हो॥ ७॥
नेशेऽयं सततं देही नृपते पुण्यपापयोः।
तत एव समुत्थेन तमसा रुध्यतेऽपि च ॥ ८॥
नरेश्वर ! यह जीवात्मा पुण्य और पापके फल सुख और दुःख भोगनेमें स्वतन्त्र नहीं है, उन पुण्य और पापोंसे उत्पन्न संस्काररूप अन्धकारसे यह आच्छन्न हो जाता है॥ ८॥
यथाञ्जनमयो वायुः पुनर्मानःशिलं रजः।
अनुप्रविश्य तद्वर्णो दृश्यते रञ्जयन् दिशः ॥ ९ ॥
तथा कर्मफलैर्देही रञ्जितस्तमसावृतः।
विवर्णो वर्णमाश्रित्य देहेषु परिवर्तते ॥ १०॥
जैसे अन्धकारमयी वायु मैनसिलके लाल-पीले चूर्णमें प्रवेश करके उसीके रंगसे युक्त हो सम्पूर्ण दिशाओंको रँगती दिखायी देती है, उसी प्रकार स्वभावतः वर्णविहीन यह जीवात्मा तमोमय अज्ञानसे आवृत्त और कर्मफलसे रंजित हो वही वर्ण ग्रहणकर अर्थात् विभिन्न शरीरोंके धर्मोंको स्वीकार करके समस्त प्राणियोंके शरीरोंमें घूमता रहता है ॥ ९-१०॥
ज्ञानेन हि यदा जन्तुरज्ञानप्रभवं तमः।
व्यपोहति तदा ब्रह्म प्रकाशति सनातनम् ॥ ११॥
जब जीव तत्त्वज्ञानद्वारा अज्ञानजनित अन्धकारको दूर कर देता है, तब उसके हृदयमें सनातन ब्रह्म प्रकाशित हो जाता है ॥ ११॥