गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context* वृत्रगीता * २१३
लोगोंद्वारा सम्मानित होकर भी हमें यहाँ महान् दुःख प्राप्त हुआ है॥ २॥
कदा वयं करिष्यामः संन्यासं दुःखसंज्ञकम्।
दुःखमेतच्छरीराणां धारणं कुरुसत्तम॥ ३॥
कुरुश्रेष्ठ! संसारी मनुष्य जिसे दुःख कहते हैं, उस संन्यासका अवलम्बन हमलोग कब करेंगे? हमें तो इन शरीरोंका धारण करना ही दुःख जान पड़ता है॥ ३॥
विमुक्ताः सप्तदशभिर्हेतुभूतैश्च पञ्चभिः।
इन्द्रियार्थैर्गुणैश्चैव अष्टाभिश्च पितामह॥ ४॥
न गच्छन्ति पुनर्भावं मुनयः संशितव्रताः।
कदा वयं गमिष्यामो राज्यं हित्वा परंतप॥ ५॥
पितामह! पंच ज्ञानेन्द्रिय, पंच कर्मेन्द्रिय, पंच प्राण, मन और बुद्धि—ये सत्रह तत्त्व; काम, क्रोध, लोभ, भय और स्वप्न—ये संसारके पाँच हेतु; शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच विषय; सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण तथा पाँच भूतोंसहित अविद्या, अहंकार और कर्म—ये आठ तत्त्वोंके समुदाय सब मिलाकर अड़तीस तत्त्व होते हैं। इन सबसे मुक्त हुए तीक्ष्ण व्रतधारी मुनि पुनर्जन्मको नहीं प्राप्त होते हैं। परंतप पितामह! हमलोग भी कब अपना राज्य छोड़कर इसी स्थितिको प्राप्त होंगे॥ ४-५॥
भीष्म उवाच
नास्त्यनन्तं महाराज सर्वं संख्यानगोचरः।
पुनर्भावोऽपि विख्यातो नास्ति किञ्चिदिहाचलम्॥ ६॥
भीष्मजीने कहा—महाराज! दुःख अनन्त नहीं हैं। जगत्की सभी वस्तुएँ संख्याकी सीमामें ही हैं—असंख्य नहीं हैं। पुनर्जन्म भी नश्वरताके लिये विख्यात ही है। तात्पर्य यह कि इस जगत्में कोई भी वस्तु अचल या स्थायी नहीं है॥ ६॥