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Read in context| ६०२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड—प्रेतकल्प ] |
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मनुष्य इस महापुराणको सुने या जो इसको पढ़े, वह इस लोक और परलोक सभीमें सुख प्राप्त करता है। संयमनी पुरीमें जाते हुए प्रेतको जो दुःख प्राप्त होता है, उसका जैसा निरूपण इस महापुराणमें किया गया है। इसे सुननेसे जो पुण्य होता है, उसके कारण वह प्रेत मुक्त हो जाता है। इस महापुराणमें कहे गये कर्म-विपाकादिको सुननेसे मनुष्यको यहींपर वैराग्य प्राप्त हो जाता है। अतः जिस प्रकारसे हो सके प्राणीको इसे अवश्य सुनना चाहिये।
हे जितेन्द्रिय ऋषियो! आप लोग मुनीश भगवान् श्रीकृष्णका भजन करें, जिनके मुखसे निकली हुई सुधासारकी धाराके मात्र एक वर्णरूपी सीकरको श्रुतिपूरकरूपी चिल्लूसे पीकर परमात्माके साथ ऐक्य प्राप्त हो जाता है।
**व्यासजीने कहा—**इस प्रकार सूतके मुखसे निकली हुई समस्त शास्त्रोंके अर्थसे सुशोभित भगवान् विष्णुकी वाणीका अमृत पान करके ऋषिगण परम संतुष्ट हुए। परस्पर उन लोगोंके बीच सर्वार्थदर्शी सूतजी महाराजकी प्रशंसा होने लगी। शौनक आदि ऋषियोंको भी अत्यन्त प्रसन्नता हुई। सूतजीके द्वारा कही गयी पक्षिराज गरुडके संदेहोंको विनष्ट करनेवाली भगवान् विष्णुकी वाणीको सुनकर जितेन्द्रिय मुनिराज शौनकने मन-ही-मन अपनेको धन्य माना। उस समय अपनी उदार वाणीसे उन मुनियोंने सूतजीको बार-बार धन्य हैं, आप धन्य हैं—कहकर धन्यवाद दिया। तदनन्तर यज्ञ समाप्त होनेपर उन्हें विदाई दी।
'यह गरुडमहापुराण बड़ा ही पवित्र और पुण्यदायक है। यह सभी पापोंका विनाशक एवं सुननेवालोंकी समस्त कामनाओंका पूरक है। इसका सदैव श्रवण करना चाहिये'—
पुराणं गारुडं पुण्यं पवित्रं पापनाशनम्।
शृण्वतां कामनापूरं श्रोतव्यं सर्वदैव हि॥
(४९।१३२)
इस महापुराणको सुननेके बाद वाचकको शय्यादि सभी प्रकारके विधिवत् दान देनेका विधान है अन्यथा कथा सुननेका लाभ उन्हें नहीं प्राप्त होता। श्रोताको सर्वप्रथम इस महापुराणकी पूजा करनी चाहिये। उसके बाद वस्त्र, अलंकार, गौ तथा दक्षिणा आदिसे वाचककी ससम्मान पूजा करनी चाहिये। अधिक पुण्य-लाभके लिये अधिकाधिक अन्नदान, स्वर्णदान और भूमिदानसे वाचककी पूजा करनी चाहिये। 'जो मनुष्य इस महापुराणको सुने या जैसे भी हो, वैसे ही उसका पाठ करे तो वह प्राणी यमराजकी भयंकर यातनाओंको तोड़कर निष्पाप होकर स्वर्गको प्राप्त करता है'—
यश्चेदं शृणुयान्मर्त्यो यश्चापि परिकीर्तयेत्।
विहाय यातनां घोरां धूतपापो दिवं व्रजेत्॥
(४९।१३६)
॥ धर्मकाण्ड—प्रेतकल्प सम्पूर्ण ॥