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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 569 of 634

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Page 569

प्रेतकल्प ]    यमलोक, यममार्ग, यमराजके भवन    ५५९


यमलोकका विस्तार छियासी हजार योजन है। मनुष्यलोकके बीचसे ही उस लोकका मार्ग है, जो धौकनीसे दहकाये गये ताँबेके समान प्रज्वलित और दुर्गम महापथ है। पापी तथा मूर्ख व्यक्ति वहाँ जाते हैं। अत्यन्त तेज, देखनेमें महाभयंकर लगनेवाले अनेक प्रकारके काँटे उस महापथमें हैं। उन्हीं काँटोंसे परिव्याप्त, ऊँची-नीची, अग्निके समान दहकती हुई उस महापथकी भूमि है। वहाँ वृक्षोंकी कोई छाया भी नहीं है, जहाँपर ऐसा मनुष्य रुक करके विश्राम कर सके। उस मार्गमें अन्नादिकी भी व्यवस्था नहीं है, जिसके द्वारा प्राणी अपने प्राणोंकी रक्षा कर सके। वहाँ जल भी नहीं दिखायी देता है, जिससे उसकी प्यास बुझ जाती हो। भूख-प्याससे पीड़ित वह पापी उसी महापथमें चलता है। अत्यन्त दुर्गम उस यममार्गमें वह ठंडकसे काँपने लगता है। जिसका जितना और जिस प्रकारका पाप है, उसका उतना वैसा ही मार्ग है। अत्यन्त दीन-हीन-कृपण और मूर्ख तथा दुःखसे व्याप्त प्राणी उसी मार्गको पार करते हैं। आत्मकृत दोषोंसे बारम्बार संतप्त कुछ लोग वहाँके असह्य कष्टसे व्यथित होकर करुण चीत्कार करते हैं, कुछ लोग वहाँकी कुव्यवस्थाके प्रति विद्रोह कर देते हैं।

हे खगेश ! उस कठोर मार्गको ऐसा ही जानना चाहिये। जो लोग इस संसारके प्रति किसी प्रकारकी तृष्णा नहीं रखते हैं, वे उस मार्गपर सुखपूर्वक जाते हैं। पृथ्वीपर मनुष्य जिन-जिन वस्तुओंका दान देता है, वे सभी वस्तुएँ यमलोक तथा उस महापथमें उसके सामने उपस्थित रहती हैं। जिस पापीको श्राद्ध और जलाञ्जलि नहीं प्राप्त होती है, वे पाप-कर्म करनेवाले क्षुद्र प्राणी वायु बनकर भटका करते हैं।

हे सुव्रत ! मैंने इस प्रकारके उस रौद्र पथको तुम्हें बता दिया है। अब मैं पुनः यममार्गकी स्थिति बताऊँगा।

दक्षिण और नैर्ऋत दिशाके मध्यमें विवस्वत्पुत्र यमराजकी पुरी है। वह सम्पूर्ण नगर वज्रमय तथा दिव्य है। देवता और असुर भी उसका भेदन नहीं कर सकते हैं। वह चौकोर है, उसमें चार द्वार तथा सात चहारदीवारी एवं तोरण हैं। यमराज स्वयं अपने दूतोंके साथ उसीमें निवास करते हैं। प्रमाणतः उसका विस्तार एक हजार योजन है। सभी प्रकारके रत्नोंसे परिव्याप्त, चमकती हुई बिजली तथा सूर्यके तेजस्वी स्वरूपके समान वह पुरी दिव्य है। उस पुरीमें धर्मराजका जो भवन है, वह स्वर्णके समान कान्तिमान् है। उसका विस्तार पाँच सौ योजन ऊँचा है। हजार खंभोंवाले उस भवनको वैदूर्य मणियोंसे सुसज्जित किया गया है। उसके जालमार्ग अर्थात् गवाक्ष मुक्तामणियोंसे बने हैं। सैकड़ों पताकाएँ उसकी शोभा बढ़ाती हैं। घण्टोंकी सैकड़ों ध्वनियाँ उस भवनमें होती रहती हैं। उसमें सैकड़ों तोरणद्वार बनाये गये हैं। इसी प्रकारसे वह भवन अन्यान्य आभूषणोंसे विभूषित रहता है।

वहाँ दस योजनमें विस्तृत नीले मेघके समान शोभा-सम्पन्न, सम एवं शुभ आसनपर भगवान् धर्मराज स्थित रहते हैं। ये धर्मज्ञ, धर्मशील, धर्मयुक्त और कल्याणकारी हैं। ये ही पापियोंको भय देनेवाले तथा धार्मिकोंको सुख देनेवाले हैं। यहाँपर शीतल मन्द वायु बहती रहती है, अनेक प्रकारके उत्सव और व्याख्यान होते रहते हैं, सदैव शंख आदि माङ्गलिक वाद्योंकी ध्वनियाँ सुनायी देती हैं। उन्हींके बीच धर्मराजका सम्पूर्ण समय बीतता है।

उस पुरके मध्यभागमें प्रवेश करनेपर चित्रगुप्तका