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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 568 of 634

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Page 568

५५८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड-

महारन्ध्रमें सत्यलोक है। इस प्रकार मनुष्यके इसी शरीरमें चौदह भुवन विद्यमान हैं।

शरीरके त्रिकोणमें मेरु, अधःकोणमें मन्दर, दक्षिणमें कैलास, वामभागमें हिमालय, ऊर्ध्वभागमें निषध, दक्षिणमें गन्धमादन और वामरेखामें मलय—इन सात कुल पर्वतोंकी स्थिति है। इस देहके अस्थिभागमें जम्बूद्वीप, मज्जामें शाकद्वीप, मांसमें कुशद्वीप, शिराओंमें क्रौञ्चद्वीप, त्वचामें शाल्मलिद्वीप, रोम-समूहमें प्लक्षद्वीप और नखोंमें पुष्कर नामका द्वीप है। उसके बाद शरीरमें सागरोंका स्थान है। जैसे मूत्रमें क्षारोदसागर, शरीरके क्षारतत्त्वमें क्षीरसागर, श्लेष्मामें सुरोदधिसাগর, मज्जामें घृतसागर, रसमें रसोदधिसাগর, रक्तमें दधिसागर, काकुमें लटकते हुए मांसलभागमें स्वादूदक-सागर तथा शुक्रमें गर्भोदकसागर है। नादचक्रमें सूर्य, बिन्दुचक्रमें चन्द्रमा, नेत्रमें मंगल, हृदयमें बुध, विष्णुस्थानमें गुरु, शुक्रमें शुक्र, नाभिस्थानमें शनि, मुखमें राहु और पायुमें केतुको माना गया है। इस प्रकार शरीरमें ग्रहमण्डलकी स्थिति है।

मनुष्यका आपादमस्तक—सम्पूर्ण शरीर इसी सृष्टिके रूपमें विभक्त है। जो लोग इस संसारमें उत्पन्न होते हैं, वे मृत्युको निश्चित ही प्राप्त होते हैं। भूख, प्यास, क्रोध, दाह, मूर्च्छा, बिच्छूके डंक तथा सर्पके दंशसे उत्पन्न कष्ट सब इसी शरीरमें हैं। समयके पूरा हो जानेपर सभी प्राणियोंका विनाश निश्चित है। यमलोकमें गये हुए जीवके आगे-आगे वही लोग दौड़ते हैं, जो पापी हैं, अधम हैं और दया-धर्मसे दूर हैं। यमदूत उनके बाल पकड़कर घसीटते हुए अत्यन्त संतप्त मरुस्थल तथा दहकते हुए अंगारोंके बीचसे ले जाते हैं। अत्यन्त दुःखसे कातर इन पापियोंको यमलोककी एक झोपड़ीमें तबतक रहना पड़ता है, जबतक पुनर्जन्म नहीं होता है।

हे तार्क्ष्य! इस प्रकार जीव कर्मानुसार जन्म लेता है और मृत्युको प्राप्त होता है। इस संसारमें जो उत्पन्न हुए हैं, वे अवश्य ही मरेंगे—इसमें संदेह नहीं है। 'आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु—ये पाँचों गर्भमें प्राणीके रहनेके समय ही निश्चित हो जाते हैं'—

आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च॥
पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः।
(३२। १२५-१२६)

जीव कर्मसे ही जन्म लेता है और विनष्ट होता है। सुख-दुःख, भय एवं कल्याण कर्मसे ही प्राप्त होते हैं। नीचेकी ओर मुख तथा ऊपरकी ओर पैर किये हुए प्राणीको गर्भसे वायु ही खींचकर बाहर लाता है। जन्म लेते ही उस देहधारीको सद्यः विष्णुकी माया सम्मोहित कर लेती है। अपने द्वारा किये गये पाप-पुण्यसे सम्बन्धित योनिमें जीवको जन्म प्राप्त होता है।

हे खगेश्वर! उत्तम प्रकृतिवाला व्यक्ति अपने सुकृतसे अच्छे भोग भोगता है, उसका जन्म भी सत्कुलमें होता है। किंतु जैसे-जैसे उसके द्वारा दुष्कृत होता है, वैसे-ही-वैसे उसका जन्म भी नीच कुलमें होने लगता है। वह उसी दुष्कर्मसे दरिद्र, रोगी, मूर्ख और अन्यान्य दुःखोंका पात्र बन जाता है। (अध्याय ३२)


यमलोक, यममार्ग, यमराजके भवन तथा चित्रगुप्तके भवनका वर्णन, यमदूतोंद्वारा पापियोंको पीड़ित करना

गरुडने कहा— हे तात! आपने अपने इस पुत्रको जीवकी उत्पत्तिका सम्पूर्ण लक्षण बता दिया, किंतु सचराचर—इन तीनों लोकोंके बीच यमलोकका कितना परिमाण है? उसका विस्तार मुझे बतायें। उसके मार्गकी कितनी दूरी है? हे देव! किन पापोंके करनेसे अथवा किस शुभ कर्मके प्रभावसे मानवजाति वहाँ जाती है? विशेष रूपसे बतानेकी कृपा करें।

श्रीभगवान्ने कहा— हे पक्षिराज! प्रमाणतः