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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 539 of 634

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Page 539

प्रेतकल्प ] प्रेतयोनि दिलानेवाले निन्दित कर्म ५२९


विश्वास न हो रहा हो, कुछ ज्योतिषी पीड़ाको प्रेतजन्य कहते हों, कभी भी मनुष्यको प्रेत स्वप्नमें न दिखायी दे, उसकी कोई चेष्टा न होती हो तो उस समय मनुष्यको क्या करना चाहिये ? उस उपायको मुझे बतायें।

श्रीभगवान्ने कहा— हे खगराज ! पृथ्वीके देवता ब्राह्मण जो कुछ भी कहते हैं, उस वचनको हृदयसे सत्य समझकर भक्ति-भावपूर्वक पितृभक्तिनिष्ठ हो पुरश्चरणपूर्वक नारायणबलि करके जप, होम तथा दानसे देह-शोधन करना चाहिये। उससे समस्त विघ्न नष्ट हो जाते हैं। यदि वह प्राणी भूत, प्रेत, पिशाच अथवा अन्य किसीसे पीड़ित होता है तो उसको अपने पितरोंके लिये नारायणबलि करनी चाहिये। ऐसा कर वह सभी प्रकारकी पीड़ाओंसे मुक्त हो जाता है। यह मेरा सत्य वचन है। अतः सभी प्रयत्नोंसे पितृभक्तिपरायण होना चाहिये।

नवें या दसवें वर्ष अपने पितरोंके निमित्त प्राणीको दस हजार गायत्री-मन्त्रोंका जप करके दशांश होम करना चाहिये। नारायणबलि करके वृषोत्सर्गादि क्रियाएँ करनी चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्य सभी प्रकारके उपद्रवोंसे रहित हो जाता है, समस्त सुखोंका उपभोग करता है तथा उत्तम लोकको प्राप्त करता है और उसे जाति-प्राधान्य प्राप्त होता है। इस संसारमें माता-पिताके समान श्रेष्ठ अन्य कोई देवता नहीं है। अतः सदैव सम्यक् प्रकारसे अपने माता-पिताकी पूजा करनी चाहिये। हितकर बातोंका उपदेष्टा होनेसे पिता प्रत्यक्ष देवता है। संसारमें जो अन्य देवता हैं वे शरीरधारी नहीं हैं—

पितृमातृसमं लोके नास्त्यन्यद्दैवतं परम्।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पूजयेत् पितरौ सदा॥
हितानामुपदेष्टा हि प्रत्यक्षं दैवतं पिता।
अन्या या देवता लोके न देहप्रभवो हि ताः ॥ (२१।२८-२९)

प्राणियोंका शरीर ही स्वर्ग एवं मोक्षका एकमात्र साधन है। ऐसा शरीर जिसके द्वारा प्राप्त हुआ है, उससे बढ़कर पूज्य कौन है ?

हे पक्षिन् ! ऐसा विचार करके मनुष्य जो-जो दान देता है उसका उपभोग वह स्वयं करता है, ऐसा वेदविद् विद्वानोंका कथन है। पुन्नामका जो नरक है उससे पिताकी रक्षा पुत्र करता है। उसी कारणसे इस लोक और परलोकमें उसे पुत्र कहा जाता है—

पुन्नामनरकाद्यस्मात् पितरं त्रायते सुतः।
तस्मात् पुत्र इति प्रोक्त इह चापि परत्र च॥ (२१।३२)

हे खगराज ! किसीके माता-पिताकी अकालमृत्यु हो जाय तो उसे व्रत, तीर्थ, वैवाहिक माङ्गलिक कार्य संवत्सरपर्यन्त नहीं करना चाहिये। जो मनुष्य प्रेत-लक्षण बतानेवाले इस स्वप्नाध्यायका अध्ययन अथवा श्रवण करता है, वह प्रेतका एक चिह्न नहीं देखता है। (अध्याय २१)


प्रेतयोनि दिलानेवाले निन्दित कर्म, पञ्चप्रेतोपाख्यान तथा प्रेतत्वप्राप्ति न करानेवाले श्रेष्ठ कर्म

श्रीगरुड़ने कहा— हे प्रभो ! प्रेतोंकी उत्पत्ति कैसे होती है ? वे कैसे चलते हैं ? उनका कैसा रूप और कैसा भोजन होता है ? वे किस प्रकार प्रसन्न होते हैं और उनका कहाँ निवास होता है? हे प्रसन्नचित्त देवेश ! कृपा कर मेरे इन प्रश्नोंका समाधान करें।

श्रीभगवान्ने कहा— हे पक्षिराज ! सुनो। जो पूर्वजन्मसंचित कर्मके अधीन रहकर पापकर्ममें