Skip to content
SarvaKosh
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished634 pages

Page 538 of 634

Read in context
Page 538

५२८ संक्षिप्त गरुडपुराण [ धर्मकाण्ड-


प्रेतबाधाजन्य दीखनेवाले स्वप्न, उनके निराकरणके उपाय तथा नारायणबलिका विधान

**श्रीगरुडने कहा—**हे भगवन्! प्रेत किस प्रकारसे मुक्त होते हैं? जिनकी मुक्ति होनेपर मनुष्योंको प्रेतजन्य पीड़ा पुनः नहीं होती। हे देव! जिन लक्षणोंसे युक्त बाधाको आपने प्रेतजन्य कहा है, उनकी मुक्ति कब सम्भव है और क्या किया जाय कि प्राणीको प्रेतत्वकी प्राप्ति न हो सके? प्रेतत्व कितने वर्षोंका होता है? चिरकालसे प्रेतयोनिको भोग रहा प्राणी उससे किस प्रकार मुक्त हो सकता है? यह सब आप बतलानेकी कृपा करें।

**श्रीकृष्णने कहा—**हे गरुड! प्रेत जिस प्रकार प्रेतयोनिसे मुक्त होते हैं, उसे मैं बतला रहा हूँ। जब मनुष्य यह जान ले कि प्रेत मुझको कष्ट दे रहा है तो ज्योतिर्विदोंसे इस विषयमें निवेदन करे। प्रेतग्रस्त प्राणीको बड़े ही अद्भुत स्वप्न दिखायी देते हैं। जब तीर्थ-स्नानकी बुद्धि होती है, चित्त धर्मपरायण हो जाता है और धार्मिक कृत्योंको करनेकी मनुष्यकी प्रवृत्ति होती है तब प्रेतबाधा उपस्थित होती है एवं उन पुण्य कार्योंको नष्ट करनेके लिये चित्त-भंग कर देती है। कल्याणकारी कार्योंमें पग-पगपर बहुत-से विघ्न होते हैं। प्रेत बार-बार अकल्याणकारी मार्गमें प्रवृत्त होनेके लिये प्रेरणा देते हैं। शुभकर्मोंमें प्रवृत्तिका उच्चाटन और क्रूरता—यह सब प्रेतके द्वारा किया जाता है। जब व्यक्ति समस्त विघ्नोंको विधिवत् दूर करके मुक्ति प्राप्त करनेके लिये सम्यक् उपाय करता है तो उसका वह कर्म हितकारी होता है और उसके प्रभावसे शाश्वत प्रेतनिवृत्ति हो जाती है।

हे पक्षिन्! दान देना अत्यन्त श्रेयस्कर है, दान देनेसे प्रेत मुक्त हो जाता है। जिसके उद्देश्यसे दान दिया जाता है, उसको तथा स्वयंको वह दान तृप्त करता है। हे तार्क्ष्य! यह सत्य है कि जो दान देता है वही उसका उपभोग करता है। दानदाता दानसे अपना कल्याण करता है और ऐसा करनेसे प्रेतको भी चिरकालिक संतृप्ति प्राप्त होती है। संतृप्त हुए वे प्रेत सदैव अपने बन्धु-बान्धवोंका कल्याण चाहते हैं। यदि विजातीय दुष्ट प्रेत उसके वंशको पीड़ित करते हैं तो संतृप्त हुए सगोत्री प्रेत अनुग्रहपूर्वक उन्हें रोक देते हैं। उसके बाद समय आनेपर अपने पुत्रसे प्राप्त हुए पिण्डादिक दानके फलसे वे मुक्त हो जाते हैं। हे पक्षिराज! यथोचित दानादिके फलसे संतृप्त प्रेत बन्धु-बान्धवोंको धन्य-धान्यसे समृद्धि प्रदान करते हैं।*

जो व्यक्ति स्वप्नमें प्रेत-दर्शन, भाषण, चेष्टा और पीड़ा आदिको देखकर भी श्राद्धादिद्वारा उनकी मुक्तिका उपाय नहीं करता, वह प्रेतोंके द्वारा दिये गये शापसे संलिप्त होता है। ऐसा व्यक्ति जन्म-जन्मान्तरतक निःसन्तान, पशुहीन, दरिद्र, रोगी, जीविकाके साधनसे रहित और निम्नकुलमें उत्पन्न होता है। ऐसा वे प्रेत कहते हैं और पुनः यमलोक जाकर पापकर्मोंका भोगद्वारा नाश हो जानेके अनन्तर अपने समयसे प्रेतत्वकी मुक्ति हो जाती है।

**गरुडने कहा—**हे देवेश्वर! यदि किसी प्रेतका नाम और गोत्र न ज्ञात हो सके, उसके विषयमें


* स भवेत् तेन मुक्तस्तु दत्तं श्रेयस्करं परम्। स्वयं तृप्यति भोः पक्षिन् यस्योद्देश्येन दीयते॥
शृणु सत्यमिदं तार्क्ष्य यद्ददाति भुनक्ति सः। आत्मानं श्रेयसा युञ्ज्यात् प्रेतस्तृप्तिं चिरं व्रजेत्॥
ते तृप्ताः शुभमिच्छन्ति निजबन्धुषु सर्वदा। अज्ञातयस्तु ये दुष्टाः पीडयन्ति स्ववंशजान्॥
निवारयन्ति तृप्तास्ते जायमानानुकम्पकाः। पश्चात् ते मुक्तिमायान्ति काले प्राप्ते स्वपुत्रतः॥ (२१। १२—१५)