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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 537 of 634

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Page 537

प्रेतकल्प ] प्रेतबाधाका स्वरूप तथा मुक्तिके उपाय ५२७

देवता और ब्राह्मणोंकी निन्दा करता है, उसे हत्याका दोष लगता है। यह पीड़ा प्रेतसे पैदा होती है। नित्य-कर्मसे दूर, जप-होमसे रहित और पराये धनका अपहरण करनेवाला मनुष्य दुःखी रहता है, इन दुःखोंका कारण भी प्रेतबाधा ही है। अच्छी वर्षा होनेपर भी कृषिका नाश होता है, व्यवहार नष्ट हो जाता है, समाजमें कलह उत्पन्न होता है, ये सभी कष्ट प्रेतबाधासे ही होते हैं। हे पक्षिराज ! मार्गमें चलते हुए पथिकको जो बवंडरसे पीड़ा होती है, उसको भी तुम्हें प्रेतबाधा समझना चाहिये। यह बात मैं सत्य ही कह रहा हूँ।

प्राणी जो नीच जातिसे सम्बन्ध रखता है, हीन कर्म करता है और अधर्ममें नित्य अनुरक्त रहता है, वह प्रेतसे उत्पन्न पीड़ा है। व्यसनोंसे द्रव्यका नाश हो जाता है, प्राप्तव्यका विनाश हो जाता है। चोर, अग्नि और राजासे जो हानि होती है, यह प्रेतसम्भूत पीड़ा है। शरीरमें महाभयंकर रोगकी उत्पत्ति, बालकोंकी पीड़ा तथा पत्नीका पीड़ित होना—ये सब प्रेतबाधाजनित हैं। वेद, स्मृति-पुराण एवं धर्मशास्त्रके नियमोंका पालन करनेवाले परिवारमें जन्म होनेपर भी धर्मके प्रति प्राणीके अन्तःकरणमें प्रेमका न होना प्रेतजनित बाधा ही है। जो मनुष्य प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूपसे देवता, तीर्थ और ब्राह्मणकी निन्दा करता है, यह भी प्रेतोत्पन्न पीड़ा है। अपनी जीविकाका अपहरण, प्रतिष्ठा तथा वंशका विनाश भी प्रेतबाधाके अतिरिक्त अन्य प्रकारसे सम्भव नहीं है। स्त्रियोंका गर्भ विनष्ट हो जाता है, जिनमें रजोदर्शन नहीं होता और बालकोंकी मृत्यु हो जाती है, वहाँ प्रेतजन्य बाधा ही समझनी चाहिये। जो मनुष्य शुद्ध भावसे सांवत्सरदिक श्राद्ध नहीं करता है, वह भी प्रेतबाधा है। तीर्थमें जाकर दूसरेमें आसक्त हुआ प्राणी जब अपने सत्कर्मका परित्याग कर दे तथा धर्मकार्यमें स्वार्जित धनका उपयोग न करे तो उसको भी प्रेतजन्य पीड़ा ही समझना चाहिये। भोजन करनेके समय कोपयुक्त पति-पत्नीके बीच कलह, दूसरोंसे शत्रुता रखनेवाली बुद्धि—यह सब प्रेत-सम्भूत पीड़ा है। जहाँ पुष्प और फल नहीं दिखायी देते तथा पत्नीका विरह होता है, वहाँ भी प्रेतोत्पन्न पीड़ा है।

जिन लोगोंमें सदैव उच्चाटनके अत्यधिक चिह्न दिखायी देते हैं, अपने क्षेत्रमें उसका तेज निष्फल हो जाता है तो उसे प्रेतजनित बाधा ही माननी चाहिये। जो व्यक्ति सगोत्रीका विनाशक है, जो अपने ही पुत्रको शत्रुके समान मार डालता है, जिसके अन्तःकरणमें प्रेम और सुखकी अनुभूतियोंका अभाव रहता है, वह दोष उस प्राणीमें प्रेतबाधाके कारण होता है। पिताके आदेशकी अवहेलना, अपनी पत्नीके साथ रहकर भी सुखोपभोग न कर पाना, व्यग्रता और क्रूर बुद्धि भी प्रेतजन्य बाधाके कारण होती है।

हे तार्क्ष्य ! निषिद्ध कर्म, दुष्ट-संसर्ग तथा वृषोत्सर्गके न होने और अविधिपूर्वक की गयी और्ध्वदैहिक क्रियासे प्रेत होता है। अकालमृत्यु या दाह-संस्कारसे वञ्चित होनेपर प्रेतयोनि प्राप्त होती है, जिससे प्राणीको दुःख झेलना पड़ता है। हे पक्षिराज ! ऐसा जानकर मनुष्य प्रेत-मुक्तिका सम्यक् आचरण करे। जो व्यक्ति प्रेत योनियोंको नहीं मानता है, वह स्वयं प्रेतयोनिको प्राप्त होता है। जिसके वंशमें प्रेत-दोष रहता है, उसके लिये इस संसारमें सुख नहीं है। प्रेतबाधा होनेपर मनुष्यकी मति, प्रीति, रति, लक्ष्मी और बुद्धि—इन पाँचोंका विनाश होता है। तीसरी या पाँचवीं पीढ़ीमें प्रेतबाधाग्रस्त कुलका विनाश हो जाता है। ऐसे वंशका प्राणी जन्म-जन्मान्तर दरिद्र, निर्धन और पापकर्ममें अनुरक्त रहता है। विकृत मुख तथा नेत्रवाले, क्रुद्ध स्वभाववाले, अपने गोत्र, पुत्र-पुत्री, पिता, भाई, भौजाई अथवा बहूको नहीं माननेवाले लोग भी विधिवश प्रेत-शरीर धारण कर सद्गतिसे रहित हो 'बड़ा कष्ट है', यह चिल्लाते हुए अपने पापको स्मरण करते हैं। (अध्याय २०)