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Read in context| ५२६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड- |
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हैं? इसे आप बतानेकी कृपा करें।
**श्रीकृष्णने कहा—**हे पक्षिराज! जहाँ प्रेतगण निवास करते हैं, उसको तुम सुनो। छलसे पराये धन और परायी स्त्रीका अपहरण तथा द्रोहसे मनुष्य निशाचर-योनिको प्राप्त होते हैं। जो लोग अपने पुत्रके हितचिन्तनमें ही अनुरक्त रहते हैं तथा सभी प्रकारका पाप करते हैं, वे शरीररहित होकर भूख-प्यासकी अथाह पीड़ाको सहन करते हुए यत्र-तत्र भटकते रहते हैं। वे प्रेत चोरके समान उस महापथके लिये पितृभागमें दिये गये जलका अपहरण करते हैं। तदनन्तर पुनः अपने घरमें आकर वे मित्रके रूपमें प्रविष्ट हो जाते हैं और वहींपर रहते हुए स्वयं रोग-शोक आदिकी पीड़ासे ग्रसित होकर सब कुछ देखते रहते हैं। वे एक दिनका अन्तराल देकर आनेवाले ज्वरका रूप धारण करके अपने सम्बन्धियोंको पीड़ा पहुँचाते हैं अथवा तिजरिया ज्वर बनकर और शीत-वातादिसे उन्हें कष्ट देते हैं। उच्छिष्ट अर्थात् जूठे अपवित्र स्थानोंमें निवास करते हुए उन प्रेतोंके द्वारा सदैव अभिलक्षित प्राणियोंको कष्ट देनेके लिये शिरोवेदना, विषूचिका तथा नाना प्रकारके अन्य बहुत-से रोगोंका रूप धारण कर लिया जाता है। इस प्रकार वे दुष्कर्मी प्रेत नाना दोषोंमें प्रवृत्त होते हैं।
**गरुडने कहा—**हे प्रभो! वे प्रेत किस रूपसे किसका क्या करते हैं? किस विधिसे उनकी जानकारी प्राप्त की जा सकती है? क्योंकि वे न कुछ कहते हैं, न बोलते हैं? हे हृषीकेश! यदि आप मेरा कल्याण चाहते हों तो मेरे मनके इस व्यामोहको दूर कर दें। इस कलिकालमें प्रायः बहुत-से लोग प्रेतयोनिको ही प्राप्त होते हैं।
**श्रीविष्णुने कहा—**हे गरुड! प्रेत होकर प्राणी अपने ही कुलको पीड़ित करता है, वह दूसरे कुलके व्यक्तिको तो कोई आपराधिक छिद्र प्राप्त होनेपर ही पीड़ा देता है। जीते हुए तो वह प्रेमीकी तरह दिखायी देता है, किंतु मृत्यु होनेपर वही दुष्ट बन जाता है। जो भगवान् श्रीरुद्रके मन्त्रका जप करता है, धर्ममें अनुरक्त रहता है, देवता और अतिथिकी पूजा करता है, सत्य तथा प्रिय बोलनेवाला है, उसको प्रेत पीड़ा नहीं दे पाते हैं। जो व्यक्ति सभी प्रकारकी धार्मिक क्रियाओंसे परिभ्रष्ट हो गया है, नास्तिक है, धर्मकी निन्दा करनेवाला है और सदैव असत्य बोलता है, उसीको प्रेत कष्ट पहुँचाते हैं*। हे तार्क्ष्य! कलिकालमें अपवित्र क्रियाओंको करनेवाला प्राणी प्रेतयोनिको प्राप्त होता है। हे काश्यप! इस संसारमें उत्पन्न एक ही माता-पितासे पैदा हुए बहुत-से संतानोंमें एक सुखका उपभोग करता है, एक पाप कर्ममें अनुरक्त रहता है, एक संतानवान् होता है, एक प्रेतसे पीड़ित रहता है और एक पुत्र धनधान्यसे सम्पन्न रहता है, एकका पुत्र मर जाता है, एकके मात्र पुत्रियाँ ही होती हैं। प्रेतदोषके कारण बन्धु-बान्धवोंके साथ विरोध होता है। प्रेतयोनिके प्रभावसे मनुष्यको संतान नहीं होती है। यदि संतान उत्पन्न भी होती है तो वह मर जाती है। प्रेतबाधाके कारण तो व्यक्ति पशुहीन और धनहीन हो जाता है। उसके कुप्रभावसे उसकी प्रकृतिमें परिवर्तन आ जाता है, वह अपने बन्धु-बान्धवोंसे शत्रुता रखने लगता है। अचानक प्राणीको जो दुःख प्राप्त होता है, वह प्रेतबाधाके कारण होता है। नास्तिकता, जीवन-वृत्तिकी समाप्ति, अत्यन्त लोभ तथा प्रतिदिन होनेवाले कलह—यह प्रेतसे पैदा होनेवाली पीड़ा है। जो पुरुष माता-पिताकी हत्या करता है, जो
* रुद्रजापी धर्मरतो देवतातिथिपूजकः। सत्यवाक् प्रियवादी च न प्रेतैः स हि पीड्यते ॥
सर्वक्रियापरिभ्रष्टो नास्तिको धर्मनिन्दकः। असत्यवादनिरतो नरः प्रेतैः स पीड्यते॥ (२०। १६-१७)