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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

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Page 533

प्रेतकल्प ] विविध दानादि कर्मोंका फल प्रेतको प्राप्त होना ५२३


जिसका भाग्य जैसा होता है, उसको उस मार्गमें वैसा ही भोग प्राप्त होता है। प्राणी स्वयं अपने लिये स्वस्थचित्तसे श्रद्धापूर्वक जो कुछ दान देता है, उसको वहाँपर प्राप्त करता है। मरनेपर जो बन्धु-बान्धवोंके द्वारा उसके लिये दिया जाता है, उसका आश्रय ले करके वह सुखी होता है।

गरुडने कहा—हे देवेश! तेरह पददान किसलिये करना चाहिये? यह दान किसे देना चाहिये? यह सब यथोचित रूपसे मुझे बतायें।

श्रीभगवान्‌ने कहा—हे पक्षिराज! छत्र, पादुका, वस्त्र, मुद्रिका, कमण्डलु, आसन और भोजनपात्र—ये सात प्रकारके पद माने गये हैं। पूर्ववर्णित महापथमें जो महाभयंकर 'रौद्र' नामक आतप (धूप) है, उसके द्वारा मनुष्य जलता है। छत्रका दान देनेसे प्रेतको तृप्ति देनेवाली शीतल छाया प्राप्त होती है। पादुका दान देनेसे मृतप्राणी अश्वारूढ़ होकर घोर असिपत्रवनको निश्चित ही पार कर जाते हैं। मृतप्राणीके उद्देश्यसे ब्राह्मणको आसन और भोजन देकर स्वागत करनेपर प्रेत महापथमें धीरे-धीरे चलता हुआ उस दान दिये गये अन्नको सुखपूर्वक ग्रहण करता है। कमण्डलुका दान देनेसे प्राणी उस यमलोकके महापथमें फैले हुए बहुत धूपवाले, वायुरहित और जलहीन मार्गमें निश्चित ही यथेच्छ जल एवं वायु प्राप्तकर सुखपूर्वक गमन करता है। मृतकके उद्देश्यसे जो व्यक्ति जलपूर्ण कमण्डलुका दान करता है, उसको निश्चित ही हजार पौंसलोंके दानका फल प्राप्त होता है।

उदारतापूर्वक वस्त्रका दान देनेसे प्रेतात्माको महाक्रोधी काले और पीले वर्णवाले अत्यन्त भयंकर यमदूत कष्ट नहीं देते हैं। मुद्रिका दान देनेसे उस महापथमें अस्त्र-शस्त्रसे युक्त दौड़ते हुए यमदूत दिखायी नहीं देते हैं। पात्र, आसन, कच्चा अन्न, भोजन, घृत तथा यज्ञोपवीतके दानसे पददानकी पूर्णता होती है। यममार्गमें जाता हुआ भूख-प्याससे व्याकुल एवं थका हुआ प्रेत भैंसके दूधका दान करनेसे निश्चित ही सुखका अनुभव करता है।

गरुडने कहा—हे विभो! मृत व्यक्तिके उद्देश्यसे जो कुछ भी दान अपने घरमें किया जाता है, वह प्रेततक किसके द्वारा पहुँचाया जाता है?

श्रीभगवान्‌ने कहा—हे पक्षिन्! सर्वप्रथम वरुण दानको ग्रहण करते हैं, उसके बाद वे उस दानको मेरे हाथमें दे देते हैं। मैं सूर्यदेवके हाथोंमें सौंप देता हूँ और सूर्यदेवसे वह प्रेत उस दानको लेकर सुखका अनुभव करता है*।

बुरे कर्मके प्रभावसे वंशका विनाश हो जाता है और उस कुलके सभी प्राणियोंको नरकमें तबतक रहना पड़ता है, जबतक पापका क्षय नहीं हो जाता है।

इन नरकोंकी संख्या बहुत है। पर इनमेंसे इक्कीस नरक मुख्यरूपसे उल्लेख्य हैं—तामिस्र, लौहशंकु, महारौरव, शाल्मली, रौरव, कुड़वल, कालसूत्र, पूतिमृत्तिका, संघात, लोहतोद, सविष, सम्प्रतापन, महानरक, कालोल, सजीवन, महापथ, अवीचि, अन्धतामिस्र, कुम्भीपाक, असिपत्रवन और पतन नामवाले हैं। घोर यातना भोगते हुए जिनके बहुत-से वर्ष बीत जाते हैं और यदि संतति नहीं है तो वे यमके दूत बन जाते हैं। यमके द्वारा भेजे गये वे दूत मरे हुए मनुष्यके लिये प्रतिदिन बन्धु-बान्धवोंसे दानस्वरूप प्राप्त अन्न और जलका सेवन करते हैं। मार्गके मध्यमें जब वे भूख-प्याससे व्याकुल हो जाते हैं तो मरे हुए प्राणीका हिस्सा ही लूटकर खा-पी जाते हैं। मासके अन्तमें जो भोजन और पिण्डदान देते हैं, जब उसकी प्राप्ति उन्हें हो जाती है तो वे सभी उसको खाकर संतुष्ट हो जाते


* गृह्णाति वरुणो दानं मम हस्ते प्रयच्छति। अहं च भास्करे देवे भास्करात् सोऽश्नुते सुखम्॥ (१८। २७)

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