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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

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Page 532
५२२संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

इन श्रवणदेवोंकी पूजा करता है, उसको मैं वह प्रदान करता हूँ, जिसकी प्राप्ति देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। भक्तिपूर्वक शुभ एवं पवित्र ग्यारह ब्राह्मण तथा बारहवें सपत्नीक ब्राह्मणको भोजन कराकर मेरी प्रसन्नताके लिये पूजा करनी चाहिये। ऐसा मनुष्य सभी देवताओंसे पूजित होकर सुख प्राप्त करता है। उनकी पूजासे मैं और चित्रगुप्तके सहित धर्मराज प्रसन्न होते हैं। उन्हींकी संतुष्टिसे धर्मपरायण लोग मेरे विष्णुलोकको प्राप्त करते हैं।

हे खगेश्वर ! जो प्राणी इन श्रवणदेवोंके माहात्म्य, उत्पत्ति और शुभ चेष्टाओंको सुनता है, वह पापसे संलिप्त नहीं होता है। वह इस लोकमें सुख भोगकर स्वर्गमें महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त करता है।

(अध्याय १७)


विविध दानादि कर्मोंका फल प्रेतको प्राप्त होना, पददानका माहात्म्य, जीवको अवान्तर-देहकी प्राप्तिका क्रम

श्रीकृष्णने कहा— हे पक्षिन् ! इन श्रवणदेवोंके वचनोंको सुनकर चित्रगुप्त पुनः क्षणभर स्वयं ध्यान करके मनुष्य जो कुछ भी दिन-रात पाप-पुण्य करते हैं, उन्हें धर्मराजसे निवेदन करते हैं।

हे तार्क्ष्य ! मनुष्य वाणी, शरीर और मनसे जो भी शुभाशुभ कर्म करता है, उन सबका वह भोग करता है। इस प्रकार मैंने तुम्हें प्रेतमार्गका निर्णय सुना दिया। मृत्युके पश्चात् प्रेत कहाँ रुकते हैं, उन सभी स्थानोंका भी वर्णन तुमसे कर दिया। जो मनुष्य यह सब समझकर अन्नदान तथा दीपदान करता है, वह उस महामार्गमें सुखपूर्वक गमन करता है।

जो दीपदान करते हैं, वे कुत्तोंसे परिव्याप्त लक्ष्यहीन मार्गमें पूर्ण प्रकाशके साथ गमन करते हैं। कार्तिकमासमें कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको रात्रिमें किया गया दीपदान प्राणियोंके लिये सुखकारी होता है।

अब मैं संक्षेपमें तुम्हें प्राणियोंके यममार्गके निस्तारका उपाय बताऊँगा।

हे गरुड ! वृषोत्सर्गके पुण्यसे मनुष्य पितृलोकको जाता है, एकादशाहमें पिण्डदानसे देहशुद्धि होती है। जलसे परिपूर्ण घड़ेका दान करनेसे यमदूत संतुष्ट होते हैं। उस दिन शय्यादान करनेसे मनुष्य विमानपर चढ़कर स्वर्गलोकको जाता है। विशेषतः द्वादशाहके दिन सभी प्रकारका दान देना चाहिये और तेरह पददानके लिये विहित श्रेष्ठ वस्तुओंको द्वादशाहके दिन अथवा जो जीवित रहते हुए अपने कल्याणके निमित्त दान देता है, वह उसीके सहारे महामार्गमें सुखपूर्वक गमन करता है।

हे खगराज ! उस यममार्गमें सर्वत्र एक-जैसा ही व्यवहार होता है। उत्तम, मध्यम और अधमरूपमें किसी भी प्रकारका वर्गीकरण वहाँ वर्जित है।