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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 526 of 634

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Page 526
५१६संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

पूजा करके शवको जलानेका कार्य करे। मृतकका आधा शरीर जल जानेपर घृतकी आहुति देनी चाहिये। 'लोमभ्यः स्वाहा०' इस मन्त्रसे यथाविधि होम करना चाहिये। चितापर उस प्रेतको रखकर आज्याहुति देनी चाहिये। यम, अन्तक, मृत्यु, ब्रह्मा, जातवेदस्‌के नामसे आहुति देकर एक आहुति प्रेतके मुखपर दे। सबसे पहले अग्निको ऊपरकी ओर प्रज्वलित करे। तदनन्तर चिताके पूर्वभागको उसी अग्निसे जलाये। इस प्रकार चिताको जलाकर निम्नाङ्कित मन्त्रसे अभिमन्त्रित तिलमिश्रित आज्याहुति पुनः प्रदान करे—

अस्मात् त्वमधिजातोऽसि त्वदयं जायतां पुनः।
असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा ज्वलितपावकः ॥

<div align="right">(१५।४९)</div>

'हे अग्निदेव! आप इससे उत्पन्न हुए हैं। पुनः आपसे यह उत्पन्न हुआ है। इस मृतककी स्वर्गकामनाके लिये आपके निमित्त यह स्वाहा है।'

इस प्रकार तिलमिश्रित समन्त्रक आज्याहुति देकर पुत्रको दाह करना चाहिये। उस समय उसे तेज रुदन करना चाहिये। ऐसा करनेसे मृतकको सुख प्राप्त होता है। दाह-संस्कारके पश्चात् वहींपर अस्थि-संचयन करना चाहिये। उसके बाद प्रेतके दाहजन्य क्लेशकी शान्तिके लिये पिण्डदान दे।

दाह-संस्कारके पश्चात् मृत व्यक्तिके पुत्रोंको वस्त्रके सहित स्नान करना चाहिये। तदनन्तर नामगोत्रोच्चार करते हुए वे तिलाञ्जलि दें। उसके बाद गाँव या जनपदके सभी लोग ताली बजा-बजाकर विष्णु-नाम-संकीर्तन और मृतकके गुणोंकी चर्चा करें। सभी लोग उस मृत व्यक्तिके घर आकर द्वारके दक्षिण भागमें गोमय और श्वेत सरसोंको रखें। अपने मनमें वरुणदेवका ध्यान कर नीमकी पत्तियोंका भक्षण तथा घीका प्राशन करके वे सभी अपने-अपने घर जायें।

हे खगेश्वर! कुछ लोग चितास्थानको दूधसे सींचते हैं। मृतकको जलाञ्जलि देते हुए अश्रुपात नहीं करना चाहिये। बन्धु-बान्धवोंके जो उस समय रोते हुए मुँहसे कफ और नेत्रोंसे आँसू गिराया जाता है, उसको ही वह प्रेत विवश होकर खाता है। अतः उन सभीको उस समय रोना नहीं चाहिये, अपनी शक्तिके अनुसार क्रिया करनी चाहिये।

हे तार्क्ष्य! सूर्यके अस्त हो जानेके बाद घरके बाहर अथवा कहीं एकान्तमें चौराहेपर दाह-क्रियाके दिनसे लेकर तीन दिनतक मिट्टीके पात्रमें दूध और जल देना चाहिये; क्योंकि मरनेके बाद जो मूढ-हृदय जीवात्मा है, वह पुनः उस शरीरको प्राप्त करनेकी इच्छासे यमदूतोंके पीछे-पीछे श्मशान, चौराहा तथा घरका दर्शन करता हुआ यमलोकको जाता है। प्रतिदिन दशाहतक प्रेतके लिये पिण्डदान और जलाञ्जलि देनी चाहिये। जबतक दशाह-संस्कार न हो जाय, तबतक एक जलाञ्जलि प्रतिदिन अधिक बढ़ाना अनिवार्य है। यह और्ध्वदैहिक संस्कार पुत्रके द्वारा अपेक्षित है। उसके अभावमें पत्नीको करना चाहिये। पत्नीके न होनेपर शिष्य, उसके न होनेपर सहोदर भाई कर सकता है। श्मशान अथवा अन्य किसी तीर्थमें मृतकके लिये जल और पिण्डदान देना चाहिये। पहले दिन शाक-मूल और फल, भात या सत्तू आदिमेंसे जिस-किसीद्वारा पिण्डदान दिया जाय, उसीके द्वारा बादके दिनोंमें भी पिण्डदान देना चाहिये।

हे खगेश! दस दिनोंतक प्रेतके उद्देश्यसे पुत्रगण पिण्डदान देते हैं। दिये गये पिण्डका प्रतिदिन चार भाग हो जाता है, उसके दो भागसे मृतकका शरीर बनता है, तीसरा भाग यमदूत ले लेते हैं और चौथा भाग मृतकको खानेके लिये मिलता है। नौ दिन-रातमें प्रेत पुनः शरीरयुक्त हो जाता है। शरीर बन जानेपर दसवें पिण्डसे प्राणीको अत्यधिक भूख लगती है।