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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 520 of 634

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Page 520

५१० संक्षिप्त गरुडपुराण [ धर्मकाण्ड-

अपने हाथोंसे जो नाना प्रकारके स्वादिष्ट एवं विविध व्यञ्जन खानेके लिये दिये जाते हैं, वे सभी मृत्युके पश्चात् अक्षय फल प्रदान करते हैं। जो गौ, भूमि, स्वर्ण, वस्त्र, भोजन और पद-दान अपने हाथसे दिये जाते हैं, वे सभी दान जिस-जिस योनिमें जहाँ-जहाँ दानकर्ता जाते हैं, वहाँ-वहाँ उपस्थित रहते हैं*।

जबतक प्राणीका शरीर स्वस्थ रहता है, तबतक धर्मका सम्यक् पालन करना चाहिये। अस्वस्थ होनेपर दूसरोंकी प्रेरणासे भी वह कुछ नहीं कर पाता है। यदि अपने जीवनकालमें व्यक्ति और्ध्वदैहिक कर्म नहीं कर लेता अथवा मरनेके बाद अधिकारी पुत्र-पौत्रादिकोंके द्वारा भी यह कर्म नहीं होता है तो वह वायुरूपमें भूख-प्याससे पीड़ित रात-दिन भटकता रहता है। वह कृमि, कीट अथवा पतंगा होकर बार-बार जन्म लेता है और मर जाता है। वह कभी असत् मार्गसे गर्भमें प्रविष्ट होता है एवं जन्म लेते ही तत्काल विनष्ट हो जाता है।

जबतक यह शरीर स्वस्थ और नीरोग है, जबतक इससे बुढ़ापा दूर है, जबतक इन्द्रियोंकी शक्ति किसी भी प्रकारसे क्षीण नहीं हुई है और जबतक आयु नष्ट नहीं हुई है, तबतक अपने कल्याणके लिये महान् प्रयत्न कर लेना चाहिये; क्योंकि घरमें महाभयंकर आगके लग जानेपर कुआँ खोदनेके उद्योगसे मनुष्यको क्या लाभ प्राप्त हो सकता है—

यावत्स्वस्थमिदं शरीरमरुजं यावज्जरा दूरतो
यावच्चेन्द्रियशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः।
आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महान्
संदीप्ते भवने तु कूपखनने प्रत्युद्यमः कीदृशः॥
(१३।२५)

(अध्याय १३)


और्ध्वदैहिक क्रिया, गोदान एवं वृषोत्सर्गका माहात्म्य

गरुडने कहा— हे विभो! मृत्युको प्राप्त कर रहे दुःखित व्यक्तिके द्वारा जो दान दिया जाता है, उसका क्या फल है? स्वस्थ अवस्थामें और विधिहीन जो दान दिया जाता है, उसका क्या फल है?

श्रीकृष्णने कहा— हे पक्षिश्रेष्ठ! स्वस्थ चित्तवाले मनुष्यके द्वारा दानमें दी गयी एक गौ, रोगी पुरुषके द्वारा दानमें दी गयी एक सौ गाय, मर रहे प्राणीके द्वारा दानमें धनको छोड़कर दी गयी हजार गाय तथा व्यक्तिके मर जानेपर विधिवत् पुत्र-पौत्रादिके द्वारा दानमें दी गयी एक लाख गायोंके बराबर होती है। तीर्थ एवं पात्रके समायोगसे यथाविधि एक ही गोदान कर दिया जाय तो वह अकेली गौ दाताको एक लाख गोदानका पुण्य प्रदान करती है।


* व्यञ्जनानि विचित्राणि भक्ष्यभोज्यानि यानि च। स्वहस्तेन प्रदत्तानि देहान्ते चाक्षयं फलम्॥
गोभूहिरण्यवासांसि भोजनानि पदानि च। यत्र यत्र वसेज्जन्तुस्तत्रतत्रोपतिष्ठति॥ (१३।२०-२१)