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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 519 of 634

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Page 519

प्रेतकल्प ] वृषोत्सर्ग तथा सत्कर्मकी महिमा ५०९


वृषोत्सर्ग तथा सत्कर्मकी महिमा

श्रीगरुडजीने कहा— हे देवेश ! इस भूलोकमें किस कर्मको करनेसे प्राणियोंको प्रेतयोनिकी प्राप्ति नहीं होती ? उसे आप मुझे बतायें।

श्रीकृष्णजीने कहा— अब मैं संक्षेपमें क्षयाहसे लेकर आगे की जानेवाली और्ध्वदैहिक क्रियाको कह रहा हूँ, जिसे मोक्ष चाहनेवाले लोगोंको अपने ही हाथोंसे करना चाहिये। स्त्री और विशेषरूपसे पाँच वर्षसे अधिक आयुवाले बालककी मृत्यु होनेपर उनके प्रेतत्वकी निवृत्तिके लिये वृषोत्सर्ग करना चाहिये। प्रेतत्वकी निवृत्तिके लिये वृषोत्सर्गके अतिरिक्त इस पृथ्वीपर अन्य कोई साधन नहीं है। जो मनुष्य जीवित रहते हुए वृषोत्सर्ग करता है अथवा मृत्युके पश्चात् भी जिसकी यह क्रिया सम्पन्न हो जाती है उसे दान, यज्ञ एवं व्रत किये बिना भी प्रेतत्वकी प्राप्ति नहीं होती।

गरुडने कहा— हे देवश्रेष्ठ मधुसूदन ! जीवित रहते हुए अथवा मृत्युके पश्चात् भी किस कालमें यह वृषोत्सर्ग-क्रिया होनी चाहिये ? आप इस बातको मुझे बतायें। सोलह श्राद्धोंको करनेसे अन्तमें क्या फल प्राप्त हो सकता है ?

श्रीकृष्णने कहा— हे पक्षिराज ! यदि वृषोत्सर्ग किये बिना ही पिण्डदान दिया जाता है तो उसका श्रेय दाताको नहीं प्राप्त होता। प्रत्युत वह क्रिया प्रेतके लिये निष्फल हो जाती है। जिसके एकादशाहमें वृषोत्सर्ग नहीं होता, सौ श्राद्ध करनेपर भी उसका प्रेतत्व सुस्थिर रहता है।*

गरुडने कहा— हे प्रभो ! सर्पदंशसे मरे हुए लोगोंकी अग्निदाहादि क्रिया नहीं की जाती है। यदि जलमें, सींगवाले पशु अथवा शस्त्रादिके प्रहारसे कोई मर जाता है, तो इस प्रकार असत् मृत्युको प्राप्त हुए लोगोंकी शुद्धि कैसे हो ? हे देव ! आप मेरे इस संशयको दूर करें।

श्रीकृष्णने कहा— हे खगेश ! उक्त प्रकारसे अपमृत्युको प्राप्त हुआ ब्राह्मण छः मास, क्षत्रिय ढाई मास, वैश्य डेढ़ मास एवं शूद्र एक मासमें शुद्ध हो जाता है। यदि तीर्थमें सभी प्रकारका दान देकर कोई ब्रह्मचारी मर जाता है तो वह शुद्ध होकर ऐहिक दुर्गति को प्राप्त नहीं होता। वृषोत्सर्ग आदि करके यति-धर्मका आचरण करना चाहिये। यदि संन्यास-धर्मका पालन करते हुए किसी प्राणीकी मृत्यु हो जाती है तो वह शाश्वत ब्रह्मपदको प्राप्त कर लेता है। जो व्यक्ति शिष्टाचाररहित धर्मविरुद्ध कर्म करता है, वह भी वृषोत्सर्ग आदिकी क्रिया करके यमराजके शासनमें नहीं जाता। पुत्र, सहोदर भाई, पौत्र, बन्धु-बान्धव, सगोत्री अथवा सम्पत्ति लेनेवाला उत्तराधिकारी कोई भी हो, उसको मरे हुए स्वजनके लिये वृषोत्सर्ग अवश्य करना चाहिये। पुत्रके अभावमें पत्नी, दौहित्र (नाती) और दुहिता (पुत्री) भी इस कर्मको कर सकती है। पुत्रोंके रहनेपर वृषोत्सर्ग अन्यसे नहीं कराना चाहिये।

गरुडने कहा— हे सुरेश्वर ! चाहे स्त्री हो अथवा पुरुष जिसके पुत्र नहीं है, उसका संस्कार किस प्रकारसे किया जाय ? हे देव ! इस विषयमें उत्पन्न हुई मेरी शंकाको आप भली प्रकारसे दूर करें।

श्रीकृष्णने कहा— पुत्रहीन व्यक्तिकी गति नहीं है, उसके लिये स्वर्गका सुख नहीं है। अतः ऐसे मनुष्यको सदुपायसे पुत्र अवश्य उत्पन्न करना चाहिये। पुरुष स्वयं जो कुछ भी दान देते हैं, परलोकमें वे सभी उसके सामने ही उपस्थित रहते हैं।


  • एकादशाहे प्रेतस्य यस्य नोत्सृज्यते वृषः। प्रेतत्वं सुस्थिरं तस्य दत्तैः श्राद्धशतैरपि॥ (१३।८)