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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 516 of 634

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Page 516

५०६ संक्षिप्त गरुडपुराण [ धर्मकाण्ड-

करनेके बाद भी इस संसारको पार करके प्राणी आपको कैसे प्राप्त कर सकता है? उसे आप मुझे बतायें। हे लक्ष्मीरमण! जिस प्रकार मनुष्यका संसर्ग पुनः दुःखसे न हो उस उपायको बतानेकी कृपा करें।

श्रीकृष्णने कहा—हे पक्षिराज! प्रत्येक मनुष्य अपने-अपने कर्ममें रत रहकर संसिद्धि प्राप्त कर लेता है। अपने कर्ममें अनुरक्त रहकर वह उस सिद्धिको जिस प्रकार प्राप्त करता है, उसको तुम मुझसे सुनो—

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥ (१०।९२)

हे कश्यपनन्दन! सत्कर्मसे जिसने अपने कालुष्यको नष्ट कर दिया है, वह व्यक्ति वासुदेवके निरन्तर चिन्तनसे विशुद्ध हुई बुद्धिसे युक्त होकर धैर्यसे अपना नियमन करके स्थिर रहता है, जो शब्दादि विषयोंका परित्याग कर राग-द्वेषको छोड़कर विरक्तसेवी और यथाप्राप्त भोजनसे संतुष्ट रहता है, जिसका मन-वाणी-शरीर संयमित है, जो वैराग्य धारणकर नित्य ध्यान-योगमें तत्पर रहता है, जो अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह—इन षड्विकारोंका परित्याग करके निर्भय होकर शान्त हो जाता है, वह ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। इसके बाद मनुष्योंके लिये कुछ करना शेष नहीं रह जाता—

कर्मविभ्रष्टकालुष्यो वासुदेवानुचिन्तया।
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च॥
शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च।
विरक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः॥
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः।
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्॥
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते।
अतः परं नृणां कृत्यं नास्ति कश्यपनन्दन॥
(१०।९३—९६)
(अध्याय १०)

जीवकी ऊर्ध्वगति एवं अधोगतिका वर्णन

गरुडजीने कहा—हे देवश्रेष्ठ! मनुष्ययोनि कैसे प्राप्त होती है? मनुष्य कैसे मृत्युको प्राप्त होता है? शरीरका आश्रय लेकर कौन मरता है? उसकी इन्द्रियाँ कहाँसे कहाँ चली जाती हैं? मनुष्य कैसे अस्पृश्य हो जाता है? यहाँ किये हुए कर्मको कहाँ और कैसे भोगता है और कहाँ कैसे जाता है? यमलोक और विष्णुलोकको मनुष्य कैसे जाता है? हे प्रभो! आप मुझपर प्रसन्न हों। मेरे इस सम्पूर्ण भ्रमको विनष्ट करें।

श्रीकृष्णने कहा—हे विनतानन्दन! परायी स्त्री और ब्राह्मणके धनका अपहरण करके प्राणी अरण्य एवं निर्जन स्थानमें रहनेवाले ब्रह्मराक्षसकी योनिको प्राप्त करता है। रत्नोंकी चोरी करनेवाला मनुष्य नीच जातिके घर उत्पन्न होता है। मृत्युके समय उसकी जो-जो इच्छाएँ होती हैं, उन्हींके वशीभूत हो वह उन-उन योनियोंमें जाकर जन्म लेता है। इस जीवात्माका छेदन शस्त्र नहीं कर सकता, अग्नि इसको जलानेमें समर्थ नहीं है, जल इसे आर्द्र नहीं कर सकता और वायुके द्वारा इसका शोषण सम्भव नहीं है।

हे पक्षिन्! मुख, नेत्र, नासिका, कान, गुदा और मूत्रनली—ये सभी छिद्र अण्डजादि जीवोंके शरीरमें विद्यमान रहते हैं। नाभिसे मूर्धापर्यन्त शरीरमें आठ छिद्र हैं। जो सत्कर्म करनेवाले पुण्यात्मा हैं, उनके प्राण शरीरके ऊर्ध्व छिद्रोंसे निकलकर परलोक जाते हैं। मृत्युके दिनसे लेकर एक वर्षतक जैसी विधि पहले बतायी गयी है, उसीके अनुसार सभी और्ध्वदैहिक श्राद्धादि संस्कार