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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 515 of 634

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Page 515

प्रेतकल्प ] श्राद्धान्नका पितरोंके पास पहुँचना ५०५


तत्काल दूसरे शरीरकी प्राप्ति हो जाती है? अथवा विलम्बसे उसको दूसरे शरीरमें जाना पड़ता है? वह मैं तुम्हें संक्षेपमें बता रहा हूँ।

हे गरुड! प्राणी मृत्युके पश्चात् दूसरे शरीरमें तुरंत भी प्रविष्ट हो सकता है और विलम्बसे भी। मनुष्य जिस कारण दूसरे शरीरको प्राप्त करता है, उस वैशिष्ट्यको तुम मुझसे सुनो। शरीरके अंदर जो धूमरहित ज्योतिके सदृश प्रधान पुरुष जीवात्मा विद्यमान रहता है, वह मृत्युके बाद तुरंत ही वायवीय शरीर धारण कर लेता है। जिस प्रकार एक तृणका आश्रय लेकर स्थित जोंक दूसरे तृणका आश्रय लेनेके बाद पहलेवाले तृणके आश्रयसे अपने पैरको आगे बढ़ाता है, उसी प्रकार शरीरी पूर्व-शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें जाता है। उस समय भोगके लिये वायवीय शरीर सामने ही उपस्थित रहता है। मरनेवाले शरीरके अंदर विषय ग्रहण करनेवाली इन्द्रियाँ उसके निश्चेष्ट (निर्व्यापार) हो जानेपर वायुके साथ चली जाती हैं। वह जिस शरीरको प्राप्त करता है उसको भी छोड़ देता है। जैसे स्त्रीके शरीरमें स्थित गर्भ उसके अन्नादिक कोशसे शक्ति ग्रहण करता है और समय आनेपर उसे छोड़कर वह बाहर आ जाता है, वैसे ही जीव अपना अधिकार लेकर दूसरे शरीरमें प्रवेश करता है। उस एक शरीरमें प्रविष्ट होते हुए प्राणीके कालक्रम, भोजन या गुण-संक्रमणकी जो स्थिति है उसे मूर्ख नहीं, अपितु ज्ञानी व्यक्ति ही देखते हैं।

विद्वान् लोग इसको आतिवाहिक वायवीय शरीर कहते हैं। हे सुपर्ण! भूत-प्रेत और पिशाचोंका शरीर तथा मनुष्योंका पिण्डज शरीर भी ऐसा ही होता है।

हे पक्षीन्द्र! पुत्रादिके द्वारा जो दशगात्रके पिण्डदान दिये जाते हैं, उस पिण्डज शरीरसे वायवीय शरीर एकाकार हो जाता है। यदि पिण्डज देहका साथ नहीं होता है तो वायुज शरीर कष्ट भोगता है। प्राणीके इस शरीरमें जैसे कौमार्य, यौवन और बुढ़ापेकी अवस्थाएँ आती हैं, वैसे ही दूसरे शरीरके प्राप्त होनेपर भी तुम्हें समझना चाहिये। जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रोंका परित्याग कर नये वस्त्रोंको धारण कर लेता है, उसी प्रकार शरीरी पुराने शरीरका परित्याग कर नये शरीरको धारण करता है। इस शरीरीको न शस्त्र छेद सकता है, न अग्नि जला सकती है, न जल आर्द्र कर सकता है और न वायु सुखा सकती है—

देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिः पक्षीन्द्रेत्यवधारय॥
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥
(१०।८३-८५)

जीव तत्काल वायवीय शरीरमें प्रवेश कर लेता है, यह तो मैंने तुम्हें बता दिया; अब जीवात्माको विलम्बसे जैसे दूसरा शरीर प्राप्त होता है, उसको तुम मुझसे सुनो।

हे गरुड! कोई-कोई जीवात्मा पिण्डज शरीर विलम्बसे प्राप्त करता है; क्योंकि मृत्युके बाद वह स्वकर्मानुसार यमलोकको जाता है। चित्रगुप्तकी आज्ञासे वह वहाँ नरक भोगता है। वहाँकी यातनाओंको झेलनेके पश्चात् उसे पशु-पक्षी आदिकी योनि प्राप्त होती है। मनुष्य जिस शरीरको ग्रहण करता है, उसी शरीरमें मोहवश उसकी ममता हो जाती है। शुभाशुभ कर्मोंके फल भोगकर मनुष्य इससे मुक्त भी हो जाता है।

गरुडने कहा— हे दयानिधे! बहुत-से पापोंको