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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 513 of 634

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Page 513

प्रेतकल्प ] श्राद्धान्नका पितरोंके पास पहुँचना ५०३


पके हुए फलको सिद्ध करके रामके सामने उपस्थित किया। श्राद्धकर्ममें दीक्षित प्रियतम रामकी आज्ञासे स्वयं दीक्षित होकर सीताने उस धर्मका सम्यक् पालन किया। उस समय सूर्य आकाशमण्डलके मध्य पहुँच गये और कुतुपमुहूर्त (दिनका आठवाँ मुहूर्त) आ गया था। श्रीरामने जिन ऋषियोंको निमन्त्रित किया था, वे सभी वहाँपर आ गये थे। आये हुए उन ऋषियोंको देखकर विदेहराजकी पुत्री जानकी रामकी आज्ञासे अन्न परोसनेके लिये वहाँ आयीं; किंतु ब्राह्मणोंके बीच जाकर वे तुरंत वहाँसे दूर चली गयीं और लताओंके मध्य छिपकर बैठ गयीं। सीता एकान्तमें छिप गयी हैं, इस बातको जानकर श्रीरामने यह

विचार किया कि ब्राह्मणोंको बिना भोजन कराये साध्वी सीता लज्जाके कारण कहीं चली गयी होंगी, पहले मैं इन ब्राह्मणोंको भोजन करा लूँ फिर उनका अन्वेषण करूँगा। ऐसा विचारकर श्रीरामने स्वयं उन ब्राह्मणोंको भोजन कराया। भोजनके बाद उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके चले जानेपर श्रीरामने अपनी प्रियतमा सीतासे कहा कि ब्राह्मणोंको देखकर तुम लताओंकी ओटमें क्यों छिप गयी? हे तन्वङ्गी! तुम इसका समस्त कारण अविलम्ब मुझे बताओ। श्रीरामके ऐसा कहनेपर सीता मुँहको नीचे कर सामने खड़ी हो गयीं और अपने नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई रामसे बोलीं—

सीताजीने कहा— हे नाथ! मैंने यहाँ जिस प्रकारका आश्चर्य देखा उसे आप सुनें। हे राघव! इस श्राद्धमें उपस्थित ब्राह्मणके अग्रभागमें मैंने आपके पिताका दर्शन किया, जो सभी आभूषणोंसे सुशोभित थे। उसी प्रकारके अन्य दो महापुरुष भी उस समय मुझे दिखायी पड़े। आपके पिताको देखकर मैं बिना बताये एकान्तमें चली आयी थी। हे प्रभो! वल्कल और मृगचर्म धारण किये हुए मैं कैसे राजा (दशरथ)-के सम्मुख जा सकती थी। हे शत्रुपक्षके वीरोंका विनाश करनेवाले प्राणनाथ! मैं आपसे यह सत्य ही कह रही हूँ, अपने हाथसे राजाको मैं वह भोजन कैसे दे सकती थी, जिसके दासोंके भी दास कभी भी वैसा भोजन नहीं करते रहे? तृणपात्रमें उस अन्नको रखकर मैं कैसे उन्हें ले जाकर देती? मैं तो वही हूँ जो पहले सभी प्रकारके आभूषणोंसे सुशोभित रहती थी और राजा मुझे वैसी स्थितिमें देख चुके थे। आज वही मैं कैसे राजाके सामने जा पाती? हे रघुनन्दन! उसीसे मनमें आयी हुई लज्जाके कारण मैं वापस हो गयी।

श्रीभगवान्‌ने कहा— हे गरुड! अपनी पत्नीके ऐसे वचनोंको सुनकर श्रीरामका मन विस्मित हो उठा। यह तो आश्चर्य है; ऐसा कहकर वे अपने स्थानपर चले आये। सीताने जिस प्रकार अपने पितरोंका दर्शन किया था, उसी प्रकार तुम्हें मैंने सुना दिया। अब मैं संक्षेपमें श्राद्धका माहात्म्य बता रहा हूँ, सुनो—

पितृगण अमावास्याके दिन वायुरूपमें घरके दरवाजेपर उपस्थित रहते हैं और अपने स्वजनोंसे

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