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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 512 of 634

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Page 512
५०२संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

नाम-गोत्रके उच्चारणसे तृप्ति प्राप्त होती है। संस्कार करनेवाले व्यक्तिके द्वारा कुशाच्छादित पृथ्वीपर दाहिने कन्धेपर यज्ञोपवीत करके दिये गये तीन पिण्ड उन पितरोंको संतुष्टि प्रदान करते हैं।

पितर जिस योनिमें, जिस आहारवाले होते हैं, उन्हें श्राद्धके द्वारा वहाँ उसी प्रकारका आहार प्राप्त होता है। गायोंका झुंड तितर-बितर हो जानेपर भी बछड़ा अपनी माताको जैसे पहचान लेता है, वैसे ही वह जीव जहाँ जिस योनिमें रहता है, वहाँ पितरोंके निमित्त ब्राह्मणको कराया गया श्राद्धान्न स्वयं उसके पास पहुँच जाता है—

यदाहारा भवन्त्येते पितरो यत्र योनिषु।
तासु तासु तदाहारः श्राद्धान्नेनोपतिष्ठति॥
यथा गोषु प्रनष्टासु वत्सो विन्दति मातरम्।
तथान्नं नयते विप्रो जन्तुर्यत्रावतिष्ठते॥

<div style="text-align: right;">(१०।१९-२०)</div>

पितृगण सदैव विश्वेदेवोंके साथ श्राद्धान्न ग्रहण करते हैं। ये ही विश्वेदेव श्राद्धका अन्न ग्रहण कर पितरोंको संतृप्त करते हैं। वसु, रुद्र, देवता, पितर तथा श्राद्धदेवता श्राद्धोंमें संतृप्त होकर श्राद्ध करनेवालोंके पितरोंको प्रसन्न करते हैं। जैसे गर्भिणी स्त्री दोहद (गर्भावस्थामें विशेष भोजनकी अभिलाषा)-के द्वारा स्वयंको और अपने गर्भस्थ जीवको भी आहार पहुँचाकर प्रसन्न करती है, वैसे ही देवता श्राद्धके द्वारा स्वयं संतुष्ट होते हैं और पितरोंको भी संतुष्ट करते हैं—

आत्मानं गुर्विणी गर्भमपि प्रीणाति वै यथा।
दोहदेन तथा देवाः श्राद्धैः स्वांश्च पितॄन् नृणाम्॥

<div style="text-align: right;">(१०।२३)</div>

'श्राद्धका समय आ गया है'—ऐसा जानकर पितरोंको प्रसन्नता होती है। वे परस्पर ऐसा विचार करके उस श्राद्धमें मनके समान तीव्रगतिसे आ पहुँचते हैं। अन्तरिक्षगामी वे पितृगण उस श्राद्धमें ब्राह्मणोंके साथ ही भोजन करते हैं। वे वायुरूपमें वहाँ आते हैं और भोजन करके परम गतिको प्राप्त हो जाते हैं। हे पक्षिन्! श्राद्धके पूर्व जिन ब्राह्मणोंको निमन्त्रित किया जाता है, पितृगण उन्हींके शरीरमें प्रविष्ट होकर वहाँ भोजन करते हैं और उसके बाद वे पुनः वहाँसे अपने लोकको चले जाते हैं—

निमन्त्रितास्तु ये विप्राः श्राद्धपूर्वदिने खग।
प्रविश्य पितरस्तेषु भुक्त्वा यान्ति स्वमालयम्॥

<div style="text-align: right;">(१०।२६)</div>

यदि श्राद्धकर्ता श्राद्धमें एक ही ब्राह्मणको निमन्त्रित करता है तो उस ब्राह्मणके उदरभागमें पिता, वामपार्श्वमें पितामह, दक्षिणपार्श्वमें प्रपितामह और पृष्ठभागमें पिण्डभक्षक पितर रहता है। श्राद्धकालमें यमराज प्रेत तथा पितरोंको यमलोकसे मृत्युलोकके लिये मुक्त कर देते हैं। हे काश्यप! नरक भोगनेवाले भूख-प्याससे पीड़ित पितृजन अपने पूर्वजन्मके किये गये पापका पश्चात्ताप करते हुए अपने पुत्र-पौत्रोंसे मधुमिश्रित पायसकी अभिलाषा करते हैं। अतः विधिपूर्वक पायसके द्वारा उन पितृगणोंको संतृप्त करना चाहिये।

गरुडने कहा— हे स्वामिन्! उस लोकसे आकर इस पृथ्वीपर श्राद्धमें भोजन करते हुए पितरोंको किसीने देखा भी है?

श्रीभगवान्ने कहा— हे गरुत्मन्! सुनो—देवी सीताका उदाहरण है। जिस प्रकार सीताने पुष्करतीर्थमें अपने ससुर आदि तीन पितरोंको श्राद्धमें निमन्त्रित ब्राह्मणके शरीरमें प्रविष्ट हुआ देखा था, उसको मैं कह रहा हूँ।

हे गरुड! पिताकी आज्ञा प्राप्त करके जब श्रीराम वन चले गये तो उसके बाद सीताके साथ श्रीरामने पुष्कर-तीर्थकी यात्रा की। तीर्थमें पहुँचकर उन्होंने श्राद्ध करना प्रारम्भ किया। जानकीने एक