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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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Page 449

कांड ] गीतासार ४३९

प्रतीत होनेपर भी परमार्थतः यह मिथ्या है। जिस प्रकार स्वप्नावस्थामें रथ आदिकी सत्ता प्रतीत होती है, किंतु वहाँ उनका अस्तित्व रहता नहीं है। उसी प्रकार जाग्रत्-अवस्थामें भी वे समृद्धियाँ उस प्राणीके पास नहीं रहतीं। परमार्थतः जैसे जाग्रत्-अवस्था और स्वप्न-अवस्थाके पदार्थोंका भावाभाव प्रतीत होता है, वैसे ही मायिक पदार्थ भी व्यवहार और परमार्थमें सत्-असत् हैं। स्वप्न तथा जागृतिकी स्थितिमें ऐसा ही इस परम ब्रह्मका अस्तित्व है, किंतु सुषुप्तावस्थामें प्राणीका चित्त निश्चल होता है। सभी ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियोंके साथ मन उस आत्माके साथ एकाकारकी स्थितिमें रहता है। अतः उस समय सत्-असत्‌का कुछ भी ज्ञान प्राणीको नहीं होता। इसी निश्चेष्टताको अचल और अद्वैत पद कहते हैं। ऐसा ही उस ब्रह्मका स्वरूप है।

मायाका अस्तित्व अविचारके कारण ही सिद्ध होता है। किंतु विचार करनेपर वह अस्तित्वहीन है। यह ब्रह्मके समान निरन्तर विद्यमान रहती है, ऐसा नहीं है। यह तो मात्र कल्पना है। इस प्रकार उस असत् मायाका आत्मसम्बन्धके कारण सत्यत्व सिद्ध होता है। जो सत्य होता है उसीका अस्तित्व माना जाता है और अस्तित्वके कारण ही पदार्थकी सत्यता स्वीकार की जाती है।

हे नारद! मैं अनन्त हूँ। मेरा ज्ञान भी अनन्त है। मैं अपनेमें पूर्ण हूँ। आत्माके द्वारा अनुभूत अन्तःसुख मैं ही हूँ। सात्त्विक, राजस और तामस गुणसे सम्बन्धित भावोंसे मैं नित्य परे रहता हूँ। मेरी उत्पत्ति अशुद्धतासे नहीं हुई है। मैं शुद्ध हूँ। मैं तो अमृतस्वरूप हूँ। मैं ही ब्रह्म हूँ। मैं प्राणियोंके हृदयमें प्रज्वलित वह ज्योति हूँ, जो दीपकके समान उनके अज्ञानरूपी अन्धकारको विनष्ट करती रहती है। यह आत्मज्ञानकी स्थिति है।

(अध्याय २३६)


गीतासार

श्रीभगवान्‌ने कहा— [हे नारद!] अब मैं गीताका सारतत्त्व कहूँगा, जिसे मैंने पूर्वमें अर्जुनको सुनाया था।

अष्टाङ्गयोगयुक्त और वेदान्तपारङ्गत मनुष्योंके लिये आत्म-कल्याण सम्भव है। आत्म-कल्याण ही परम कल्याण है, उस आत्मज्ञानसे उत्कृष्ट और कुछ भी लाभ नहीं है। आत्मा देहरहित, रूप आदिसे हीन, इन्द्रियोंसे अतीत है। मैं आत्मा हूँ, संसारादि सम्बन्धके कारण मुझे किसी प्रकारका दुःख नहीं है। धूमरहित प्रज्वलित अग्निशिखा जैसे प्रकाश प्राप्त करती है, वैसे ही आत्मा स्वयं प्रदीप्त रहता है। जैसे आकाशमें विद्युत्-अग्निका प्रकाश होता है, वैसे ही हृदयमें आत्माके द्वारा आत्मा प्रकाशित होता है। श्रोत्र आदि इन्द्रियोंको किसी प्रकारका ज्ञान नहीं है। वे स्वयंको भी नहीं जान सकती हैं, परंतु सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, क्षेत्रज्ञ आत्मा ही इन्द्रियोंका दर्शन करता है। जब आत्मा उज्ज्वल प्रदीपके समान हृदयपटलपर प्रकाशित होता है, तब पुरुषोंका पापकर्म नष्ट हो जाता है और ज्ञान उत्पन्न हो जाता है।

जैसे दर्पणमें दृष्टि डालनेपर अपने द्वारा अपनेको देख सकते हैं, वैसे ही आत्मामें दृष्टि करनेपर इन्द्रियोंको, इन्द्रियोंके विषयोंको तथा पञ्चमहाभूतोंका दर्शन किया जा सकता है। मन, बुद्धि, अहंकार और अव्यक्त पुरुष—इन सभीके ज्ञानके द्वारा संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाना चाहिये। सभी