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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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Page 448
४३८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

सभी तत्त्वज्ञ ज्ञानको सर्वोच्च मानते हैं, इसलिये चित्तका आलम्बन बोधस्वरूप आत्मा ही है। यह आत्मविज्ञान है। यह पूर्ण है, शाश्वत है। जागते, सोते तथा सुषुप्तावस्थामें प्राप्त होनेवाला सुख पूर्ण सुखरूप ब्रह्मका ही एक क्षुद्र अंश समझना चाहिये। जैसे एक मृण्मय वस्तुका (ज्ञान होनेपर) समस्त मृण्मय पदार्थ जान लिया जाता है।

सर्वत्र व्यास शाश्वत तत्त्व ज्ञानस्वरूप ब्रह्म यदि सदा सर्वत्र सभीके हृदयमें विद्यमान नहीं है तो विस्मृत अर्थका स्मरण नहीं होना चाहिये पर होता है। ऐसी स्थितिमें यह स्मरण किसको होता है, निश्चित ही चेतन तत्त्वको ही होता है। इसे ही आत्मा, ब्रह्म, परमात्मा आदिके रूपमें स्वीकार किया गया है। चेतनतत्त्वकी सत्ता—अणु, अशरीरी अथवा परम व्यापक तत्त्व—किसी भी रूपमें स्वीकार किया जाय, पर स्वीकार करना ही है; अन्यथा प्राणीको सुख-दुःखका अनुभव नहीं हो सकेगा। चेतनतत्त्व प्राणिमात्रके हृदयमें साक्षीरूपसे सदा विद्यमान है, इसीलिये यह उसकी प्रत्येक चेष्टाको जानता रहता है और इस जानकारीका फल यह है कि प्राणीके शुभाशुभ कर्मका फल यथासमय मिलता रहता है। यह ब्रह्मतत्त्व सत्य, ज्ञान एवं आनन्दरूप है तथा अनन्त है। सत्य ज्ञानसे पृथक् नहीं होता, अनन्ततासे पृथक् आनन्द नहीं है। वास्तवमें प्रत्येक जीव सत्य, आनन्द एवं ज्ञानस्वरूप ब्रह्म ही है। स्वयंको ब्रह्मरूपमें जानकर जीव अपने वास्तविक स्वरूप सर्वज्ञताको प्राप्त कर लेता है। जैसे एक हेममणि (पारस)-से अनन्त लौहराशि हेममय हो जाती है, उसी प्रकार ईश (ब्रह्म)-का ज्ञान होनेपर ज्ञानीके द्वारा सकल विश्व जान लिया जाता है, जैसे अन्धकारदोषके कारण रस्सी अपने सत्यस्वरूपमें नहीं दिखायी देती, वैसे ही व्यामोहसे ग्रस्त जीवको आत्माका दर्शन नहीं होता। जिस प्रकार प्रत्यक्ष होनेपर भी द्रव्य दृष्टि-दोषके कारण सही नहीं दिखायी देता है, अपितु वह कुरूप प्रतीत होता है। उसी प्रकार आकाशकी सरूपताके कारण वह आत्मतत्त्व असत्य एवं पृथक् प्रतीत होता है। जैसे रज्जुमें सर्पका और सीपमें रजतका आभास होता है और मृगमरीचिकामें जलका आभास होता है, उसी प्रकार विष्णुमें जगत्की प्रतीति होती है।

जैसे कोई द्विज ग्रहाविष्ट होनेके कारण 'मैं शूद्र हूँ' ऐसा मानता है और ग्रह-बाधा नष्ट होनेके पश्चात् वही व्यक्ति पुनः ध्यान करता हुआ अपनेको ब्राह्मण मानता है, वैसे ही मायासे आच्छन्न जीव यह 'मैं ही हूँ' ऐसा स्वीकार करता है। मायारूपी अज्ञानके समाप्त हो जानेपर पुनः वह अपने स्वरूपमें 'मैं ही ब्रह्म हूँ' ऐसा मान लेता है। जैसे ग्रहके नाश हो जानेपर उसको माननेवाला प्राणी उसे क्रूर ग्रहके रूपमें देखता है, वैसे ही अपने स्वरूपका दर्शन होनेपर मायाके अभावमें उसकी मायिक पदार्थोंसे विरक्ति हो जाती है।

जैसे संसार-चक्र अनादि है, वैसे ही उसके मूल भगवान्की माया भी अनादि है। इस मायाके सत् और असत् दो रूप हैं। व्यवहार-कालमें वह सत् और परमार्थतः असत् है। मायाके कारण ही अज परमात्मा भी अपनी मायाके आवेशसे जगत्के रूपमें परिणत होता है। मायाकी इच्छासे ही पति-पत्नी आदिके रूपमें यह सम्पूर्ण जगत् कल्पित है। अट्ठाईस तत्त्वोंका यह त्रिगुणात्मक जगत् और चौरासी लाख योनियोंके नर और नारियोंकी आकृति मायाके द्वारा ही रचित है। त्रिगुणात्मक अट्ठाईस तत्त्वोंके रूपमें मायाके द्वारा ही खण्डशः विश्वकी सृष्टि होती है। वस्तुतः नाम, रूप और क्रिया आदि जगत्की सत्ता मध्यमें ही है आदि और अन्तमें नहीं। इसलिये व्यवहार-कालमें सत्य