Skip to content
SarvaKosh
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished634 pages

Page 424 of 634

Read in context
Page 424
४१४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

जिसके द्वारा उसके जीवनकी रक्षा होती है, वह भोज्य पदार्थ है। जो मुक्तिका हेतु है, वह ज्ञान है और जो बन्धनका हेतु है, वह अज्ञान है। हे राजन्! प्राणियोंके पुण्य और पापका विनाश उसके द्वारा किये जानेवाले (सुख-दुःखात्मक) भोगोंसे होता है और अवश्यकरणीय जो कर्तव्य हैं, उनको न करनेसे पुण्यका क्षय हो जाता है।

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह—ये पाँच यम हैं। शौच दो प्रकारका बताया गया है—बाह्यशौच और अन्तःशौच। संतोष, तपस्या, शान्ति, नारायणका पूजन और इन्द्रियदमन—ये योगके साधन हैं। आसनोंके पद्म आदि भेद हैं।

शरीरके अन्तर्गत प्रवाहित होनेवाली वायुपर विजय प्राप्त करना ‘प्राणायाम’ है। प्रत्येक प्राणायाम पूरक, कुम्भक और रेचकके भेदसे तीन प्रकारका होता है। यही तीन प्राणायाम जब दस मात्राओंका होता है तो इसे लघु प्राणायाम तथा इससे दुगुनी मात्राका मध्यम प्राणायाम और तीन गुनी मात्राओंका उत्तम प्राणायाम कहा गया है। जिस प्राणायाममें योगिजन जप और ध्यानसे युक्त होते हैं, उसे ‘सगर्भ’ प्राणायाम और उसके अतिरिक्त प्राणायाम (अर्थात् जप तथा ध्यानसे रहित होनेपर) ‘अगर्भ’ नामक प्राणायाम कहलाता है। प्रथम प्राणायामसे योगी स्वप्नपर जय प्राप्त करता है, द्वितीय प्राणायामसे योगी कम्पपर और तृतीय प्राणायामसे विपाकपर* जय प्राप्त करता है। इस प्रकार इन तीनों दोषोंको योगी प्राणायामसे जीत लेता है।

योगीको आसन लगाकर ‘प्रणव’ में चित्त एकाग्र करके ध्यान और जप करना चाहिये। इस स्थितिमें वह अपनी दोनों एड़ियोंसे लिंग और अण्डकोशोंको दबाकर एकाग्र मनसे स्थित रहे। जो योगमार्गसे भलीभाँति परिचित है, उसे अपनी रजोवृत्तिसे तमोवृत्तिको तथा सत्त्ववृत्तिसे रजोवृत्तिको निरुद्ध करके निश्चल-भावसे प्रणवका जप करते हुए ध्यान करना चाहिये। इन्द्रियों, प्राण और मन आदिको उनके विषयोंसे निगृहीत करना चाहिये। इस तरह एक साथ ही प्रत्याहार (विषयोंसे इन्द्रियोंको हटाकर अन्तर्मुख करना)—का उपक्रम करना चाहिये।

विधिवत् अठारह बार किया गया जो प्राणायाम है, उसे योगमें ‘धारणा’ के नामसे स्वीकार किया जाता है। योगके तत्त्वको जाननेवाले योगिजन ऐसी धारणाकी दो आवृत्तिको ही योग कहते हैं। योगियोंकी पहली धारणा नाड़ीमें, दूसरी हृदयमें, तीसरी वक्षःस्थलमें, चौथी उदरमें, पाँचवीं कण्ठमें, छठी मुखमें, सातवीं नासाग्रपर, आठवीं नेत्रमें, नवीं दोनों भौंहोंके मध्य और दसवीं मूर्धास्थानमें होती है। इस प्रकार योगमें इस धारणाको दस प्रकारका माना गया है। इन दसों धारणाओंमें सफलता प्राप्त करके योगी अक्षयरूपता (ब्रह्मत्व)—को प्राप्त कर लेता है।

जिस प्रकार अग्निमें छोड़ी गयी अग्नि एकाकार हो जाती है, उसी प्रकार परमात्माके ध्यानमें लगायी गयी आत्मा तदाकार हो जाती है। ऐसी स्थितिमें योगीको ब्रह्मस्वरूप महापुण्यदायक ‘ॐ’ इस महामन्त्रका जप करना चाहिये। इस प्रणव-महामन्त्रमें ‘अकार, उकार और मकार’—ये तीन अक्षर हैं। इन तीन अक्षरोंके अतिरिक्त इस महामन्त्रमें सत्त्व, रजस् तथा तमस्—इन तीन मात्राओंका योग भी है जो क्रमशः सात्त्विक तथा राजसिक और तामसिक मनोवृत्तिका परिचायक है। ॐकारमें जो चतुर्थ आद्य अर्धमात्रा स्थित है, वह निर्गुण है तथा केवल योगियोंद्वारा ही जानने योग्य है। गान्धारस्वर (ग)—के आश्रित रहनेवाली इस अर्धमात्राको गान्धारी


* विपाक — कर्मफल।