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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 423 of 634

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Page 423

काण्ड ] अष्टाङ्गयोग एवं एकाक्षर ब्रह्मका स्वरूप तथा प्रणवजपका माहात्म्य [ ४१३


प्राणियोंके प्रति दया, सद्भावपूर्ण वार्तालाप, परलोकके लिये सात्त्विक अनुष्ठान, सत्कार्योंका निष्पादन, सत्यधर्मका पालन, दूसरेका हितचिन्तन, मुक्तिकी साधना, वेदोंमें प्रामाण्यबुद्धि, गुरु, देवर्षि और सिद्धर्षियोंकी सेवा, साधुजनोंद्वारा बताये गये नियमोंका पालन, सत्क्रियाओंका अनुष्ठान तथा प्राणियोंके साथ मैत्रीभाव—ये स्वर्गसे आये हुए मनुष्योंके लक्षण हैं। जो मनुष्य योगशास्त्रद्वारा बताये यम, नियमादिक अष्टाङ्गयोगके साधनसे सद्-ज्ञानको प्राप्त करता है, वह आत्यन्तिक फल अर्थात् मोक्षका अधिकारी बन जाता है।
(अध्याय २२५)


अष्टाङ्गयोग एवं एकाक्षर ब्रह्मका स्वरूप तथा प्रणवजपका माहात्म्य

सूतजीने कहा—हे द्विजश्रेष्ठ! अब मैं समस्त अङ्गोंसहित महायोगका वर्णन करूँगा। यह महायोग मनुष्योंको भोग और मोक्ष प्रदान करनेका श्रेष्ठतम साधन है। भक्तिपूर्वक इस महायोगकी विधिका पाठ करनेमात्रसे मनुष्यके सभी पापोंका विनाश हो जाता है, इसे अब आप सुनें।

महामति भगवान् दत्तात्रेयने राजा अलर्कसे कहा था कि हे राजन्! ममता ही दुःखका मूल है और ममताका परित्याग ही दुःखसे निवृत्तिका उपाय है। अहंकार अज्ञानरूपी महातरुका अंकुर है। ममता उसका तना है। घर और क्षेत्र आदि उसकी शाखाएँ हैं। पत्नी उसका पल्लव है तथा धन-धान्य महान् पत्र हैं और पाप ही उसका अत्यन्त दुर्गम मूल है। इस प्रकार पापमूलक आपातरमणीय सुख-शान्तिके लिये यह अज्ञानरूपी महातरु पैदा हुआ है। जो लोग ज्ञानरूपी कुल्हाड़ीसे अज्ञानरूप महावृक्षको काट गिराते हैं, वे ही परमब्रह्ममें लीन हो जाते हैं। तदनन्तर ब्रह्मरसको प्राप्तकर उसका भलीभाँति निष्कण्टक पान करके प्राज्ञ पुरुष नित्य-सुख एवं परम शान्तिको प्राप्त करते हैं।

समस्त दृश्य-प्रपञ्च एवं इन्द्रियाँ भी उसी (परब्रह्म)-में लीन हो जाती हैं। हे राजन्! वहाँपर न तो 'तुम' रहते हो और न 'मैं' ही रहता हूँ, न शब्दादि तन्मात्राएँ रहती हैं और न अन्तःकरण ही रहता है। हे राजेन्द्र! हम दोनोंके बीच कौन-सा तत्त्व प्रधान है? वास्तवमें हम दोनों निःसार हैं।

हे राजन्! जीव और आत्मामें ऐक्य होनेपर भी पृथक्-भावका बोध होता है। यह पृथक्-भावका बोध ज्ञान (स्वरूपज्ञान)-के तिरोधानसे होता है। यद्यपि ज्ञानका तिरोधान योगी (ब्रह्माभिन्न जीव)-में नहीं होना चाहिये, पर भेदबुद्धि एवं भेदबुद्धिमूलक समस्त प्रपञ्च सबके अनुभवमें आ रहा है; अतः इसकी उपपत्ति के लिये यह मानना पड़ता है कि ज्ञानका तिरोधान अनादिकालसे चला आ रहा है। यह ज्ञानका तिरोधान अज्ञानमूलक है। इसीलिये अज्ञानको ज्ञाननाशकी दशा कहा जाता है। यह ज्ञाननाशकी दशा ज्ञानके वियोगकी दशा है और यह ज्ञानका वियोग ही जीवात्मा एवं आत्मा (ब्रह्म)-का पृथक्-भाव है तथा इस पृथक्-भावके ज्ञानका नाश जीव एवं आत्मा (ब्रह्म)-के ऐक्यज्ञानसे ही होता है। यह ऐक्यज्ञान (ऐक्यका प्रत्यक्षात्मक अनुभव) ही मुक्ति है। अनैक्यका अनुभव तो प्राकृतगुणों (मायिक विस्तार)-के कारण होता है।

प्राणीका जिसमें निवास होता है, वह घर है।