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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 414 of 634

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Page 414

४०४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

प्रायश्चित्तनिरूपण, चान्द्रायणादि विभिन्न व्रतोंके लक्षण तथा पञ्चगव्य-विधान

श्रीब्रह्माजीने कहा— अब मैं नारकीय पापोंको विनष्ट करनेवाले प्रायश्चित्त आदि कर्मोंका वर्णन करूँगा।

मक्खी, जलकण, स्त्री, पृथ्वीपर प्राकृतिकरूपसे एकत्र जल, अग्नि, बिल्ली और नेवला—ये सदैव पवित्र माने गये हैं। जो द्विज प्रमादवश शूद्रद्वारा उच्छिष्ट<sup>२</sup> (जूँठ) तथा छुआ हुआ भोजन ग्रहण करता है, वह एक दिन-रात्रिका उपवास करके पञ्चगव्यप्राशनसे शुद्ध होता है। यदि ब्राह्मण अन्य किसी ब्राह्मणके द्वारा उच्छिष्ट तथा स्पर्श किया हुआ भोजन करता है तो उसे प्रायश्चित्तके रूपमें स्नान, जप तथा पूरे दिन उपवास करके रात्रिमें भोजन करना चाहिये। मक्खी और केशयुक्त भोजन करनेपर तत्काल 'वमन-क्रिया' करनेसे शुद्धि हो जाती है। जो मनुष्य किसी भोज्य पदार्थको एक हथेलीमें रखकर दूसरे हाथकी एक अंगुली या पूरे हाथसे खाता है और उसके बाद जल नहीं पीता है तो उसे एक दिन और एक रात्रिका उपवास करना चाहिये। एक हथेलीमें रखकर दूसरे हाथसे भोजन कर जल भी पी लिया जाय तो और कठिन प्रायश्चित्त विहित है; क्योंकि ऐसे भोजनमें बिना संकोच पूर्ण संतुष्ट होनेका भाव स्पष्ट है। पीनेसे बचे हुए तथा बाँयें हाथसे ग्रहण किये गये जलका पान करना मदिरापानके समान होता है।

चमड़ेके पात्रमें रखा गया जल अपवित्र होता है, उसे नहीं पीना चाहिये। यदि किसी द्विजके घर अज्ञानवश ही कोई अन्त्यज निवास कर ले तो उस द्विजको शुद्धिके लिये चान्द्रायण अथवा पराकव्रत करना आवश्यक है। ब्राह्मणके घरमें शूद्रका प्रवेश होनेपर तथा बादमें जानकारी होनेपर ब्राह्मणको प्राजापत्यव्रत करके प्रायश्चित्त करना चाहिये। जो ब्राह्मण घरमें शूद्रके प्रविष्ट होनेपर पक्वान्नका भोजन करता है, उसे अर्द्धकृच्छ्रव्रत करना चाहिये। अर्धकृच्छ्रव्रतके योग्य जो अशुचि है उसके घरमें अन्य कोई ब्राह्मण यदि भोजन करता है तो उसको भी एक चौथाई कृच्छ्रव्रतका पालन करना चाहिये।

जो द्विज धोबी, नट एवं बाँस और चमड़ेसे जीविकोपार्जन करनेवालोंके द्वारा अर्जित अन्नका भोजन करता है, उसे चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। चाण्डालके कुएँ अथवा पात्रमें स्थित जलका पान अज्ञानवश भी जो ब्राह्मण कर लेता है, उसे 'सान्तपनव्रत' करना चाहिये। वैश्यके लिये यह प्रायश्चित्त आधा ही माना गया है। यदि कोई शूद्र उक्त निषिद्ध जलका पान करता है तो उसको तत्सम्बन्धित व्रतका एक चौथाई प्रायश्चित्त करना चाहिये। अज्ञानवश ब्राह्मणके घर अन्त्यजके प्रवेश हो जानेपर उस ब्राह्मणको तीन कृच्छ्रव्रत करना चाहिये। अन्त्यजके घरमें आ जानेमात्रसे उत्पन्न अपवित्रताका निराकरण पराकव्रतके अनुष्ठानसे होता है। अन्त्यजके द्वारा उच्छिष्ट भोजन करनेपर द्विज 'चान्द्रायणव्रत' करनेसे शुद्ध हो जाता है। जब कभी प्रमादवश कोई ब्राह्मण चाण्डालद्वारा दिये गये अन्नका भोजन कर लेता है तो उसे चान्द्रायण (ऐन्दव)-व्रत करना चाहिये। ऐसी ही अपवित्रतामें


१-इस अध्यायमें जिन व्रतोंकी चर्चा है, संक्षेपमें उनका स्वरूप अध्यायके अन्तमें वर्णित है।
२-उच्छिष्टका अर्थ है—सिद्ध अन्नमेंसे निकालकर शूद्रने पहले भोजन कर लिया है, उसके बादका शेष अन्न। यहाँ घृणाका भाव नहीं है। पवित्रताकी दृष्टिसे यह एक निष्पक्ष व्यवस्था है।