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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 413 of 634

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Page 413

काण्ड ] धर्मसारका कथन ४०३


हे महादेव! देवता, मुनि, नाग, गन्धर्व, गुह्यकगण—ये सभी धार्मिकोंकी पूजा करते हैं, धनाढ्य और कामी व्यक्तिकी अर्चना कोई भी नहीं करता है—

देवता मुनयो नागा गन्धर्वा गुह्यका हर।
धार्मिकं पूजयन्तीह न धनाढ्यं न कामिनम्॥
(२२१।१३)

अनन्त बल, वीर्य, प्रज्ञा और पौरुषके द्वारा किसी दुर्लभ वस्तुको यदि मनुष्य प्राप्त कर लेता है तो इसके कारण किसीको ईर्ष्यावश शोकाकुल या दुःखी नहीं होना चाहिये।

सभी प्राणियोंके प्रति दयाका भाव रखना, सभी इन्द्रियोंका निग्रह करना और सर्वत्र अनित्यबुद्धि रखना यह प्राणियोंके लिये परम श्रेयस्कर है। मृत्यु सामने वर्तमान है, यह समझकर जो व्यक्ति धर्माचरण नहीं करता, उसका जीवन बकरीके गलेमें स्थित स्तनके समान निरर्थक है—

सर्वसत्त्वदयालुत्वं सर्वेन्द्रियविनिग्रहः।
सर्वत्रानित्यबुद्धित्वं श्रेयः परमिदं स्मृतम्॥
पश्यन्निवाग्रतो मृत्युं यो धर्मं नाचरेन्नरः।
अजागलस्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम्॥
(२२१।१५-१६)

हे वृषध्वज! इस लोकमें गोदानसे बढ़कर कोई दान नहीं है। जो न्यायोपार्जित धनसे प्राप्त गौका दान करते हैं, वे अपने सम्पूर्ण कुलको तार देते हैं।


हे वृषध्वज! अन्न-दानसे श्रेष्ठ और कुछ भी दान नहीं है; क्योंकि सम्पूर्ण चराचर जगत् अन्नके द्वारा ही प्रतिष्ठित है<sup>१</sup>। कन्यादान, वृषोत्सर्ग, जप, तीर्थ, सेवा, वेदाध्ययन, हाथी, घोड़ा, रथ आदिका दान, मणिरत्न और पृथ्वीदान—ये सभी दान अन्नदानके सोलहवें अंशकी भी बराबरी नहीं कर सकते हैं। अन्नसे ही प्राणियोंके प्राण, बल, तेज, वीर्य, धृति और स्मृति—ये सभी प्रतिष्ठित रहते हैं। जो कूप, वापी, तडाग और उपवनका निर्माणकर लोगोंकी संतुष्टिके लिये प्रदान करते हैं, वे अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धारकर विष्णुलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं<sup>२</sup>।

साधुओंका दर्शन करना अतिशय पुण्यदायक है। यह सभी प्रकारके तीर्थोंसे भी उत्तम है। तीर्थ तो समय आनेपर फल प्रदान करता है, किंतु सज्जनोंका संग उसी क्षण फल प्रदान कर देता है—

साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थादपि विशिष्यते।
कालेन तीर्थं फलति सद्यः साधुसमागमः॥
(२२१।२३)

सत्य, दम, तपस्या, शौच, संतोष, क्षमा, सरलता, ज्ञान, शम, दया और दान—इनको सनातनधर्म माना गया है—

सत्यं दमस्तपः शौचं सन्तोषश्च क्षमार्जवम्।
ज्ञानं शमो दया दानमेष धर्मः सनातनः॥
(२२१।२४)
(अध्याय २२१)


<sup>१</sup>-न गोदानात्परं दानं किञ्चिदस्तीति मे मतिः। या गौर्न्यायार्जिता दत्ता कृत्स्नं तारयते कुलम्॥
नान्नदानात्परं दानं किञ्चिदस्ति वृषध्वज। अन्नेन धार्यते सर्वं चराचरमिदं जगत्॥ (२२१।१८-१९)
<sup>२</sup>-कूपवापीतडागादीनारामांश्चैव कारयेत्। त्रिसप्तकुलमुद्धृत्य विष्णुलोके महीयते॥ (२२१।२२)