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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 410 of 634

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Page 410

४०० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार-

'ॐ वसुसत्यसंज्ञकेभ्यः०' इत्यादि मन्त्र पढ़कर इसी प्रकार पितामही और मातामह, प्रमातामहके लिये अन्नसंकल्पनादि क्रिया करनी चाहिये।

एकोद्दिष्टश्राद्धमें<sup>१</sup> पूर्वके समान सभी कार्य करना चाहिये। इसमें विशेष यह है कि प्रथम ब्राह्मण-निमन्त्रण, पादप्रक्षालन, आसनदान करके 'अद्य अमुकगोत्रस्य मत्पितुरमुकदेवशर्मणः प्रतिसांवत्सरिकमेकोद्दिष्टश्राद्धं सिद्धान्नेन युष्मास्वहं करिष्ये' इस संकल्प-वाक्यसे अनुज्ञाग्रहणपूर्वक आसनदान और गन्धादि तथा पक्वान्न प्रदान करना चाहिये।

इसके बाद रुचिर-स्तवादिका पाठकर तथा यज्ञसूत्र (यज्ञोपवीत) कण्ठमें धारणकर उत्तराभिमुख होकर अतिथिश्राद्ध करे। पितरोंकी तृप्ति जानकर दक्षिणाभिमुख हो वामोपवीती (अपसव्य) होकर कर्मसे उच्छिष्ट अन्नके समीपमें 'अग्निदग्धाश्च०' इत्यादि मन्त्रसे अन्न विकरण करे। तदनन्तर 'अमुकगोत्र मत्पितः०' से मण्डलरेखाके ऊपर जलधारा दे। अन्य कार्य पूर्वके समान ही समझना चाहिये। (अध्याय २१९)


सपिण्डीकरणश्राद्धकी विधि

श्रीब्रह्माजीने कहा— हे व्यासजी! अब मैं सपिण्डीकरणश्राद्धका वर्णन करता हूँ। मृत्युके सालभर बाद मृत्यु-तिथिपर यह श्राद्ध करना चाहिये। इस श्राद्धको यथासमय विधिवत् करनेसे प्रेतको पितृलोककी प्राप्ति होती है। सपिण्डीकरणश्राद्ध अपराह्नमें करना चाहिये, सभी अनुष्ठान प्रायः अन्य श्राद्धोंके समान करे। (इसमें जो विशेष है वही कहा जा रहा है।) पितामहादिके प्रतिनिधि ब्राह्मणोंको निमन्त्रित कर 'ॐ पुरूरवोमाद्रवसंज्ञकेभ्यो०' से वामपार्श्वमें आसन रखकर पुरूरवा और माद्रव नामके विश्वेदेवोंका आवाहन करना चाहिये। 'पितामहप्रपितामहानां०' इत्यादि वाक्यसे श्राद्धकी पितामह आदिके प्रतिनिधि ब्राह्मणोंसे अनुज्ञा ग्रहणकर तीन पात्र स्थापित करे। उन पात्रोंके ऊपर कुश रखकर दूसरे पात्रसे उन्हें ढक दे और आवाहन करे। इसके बाद अन्य श्राद्धोंके समान अच्छिद्रावधारणतककी<sup>२</sup> क्रिया करके सपत्नीक पिताको प्रेतपद अन्तमें प्रयुक्तकर उनका नाम उच्चारण करे। श्राद्धकी अनुज्ञा ले ले। तदनन्तर देव<sup>३</sup> पात्राच्छिद्रावधारण करे। यथाविधान कार्योंको सम्पन्नकर पितामह, प्रपितामह, वृद्धप्रपितामहके पात्रोंका क्रमसे संचालन और उद्घाटनकर 'ॐ ये समानाः समनसो०' इत्यादि मन्त्रोंसे पितृपात्रका जल पितामह और प्रपितामहके पात्रमें छोड़े। वृद्धप्रपितामहके पात्रको छोड़कर पितामह, प्रपितामहके पात्रका जल और पवित्रक पितृ-पात्रमें निक्षिप्त करे। तदनन्तर पितृ-ब्राह्मणके हाथमें अर्घ्यपात्रस्थ पवित्रक देकर उसमें स्थित पुष्प ब्राह्मणोंके सिर, हाथ और चरणोंमें समर्पित करना चाहिये। इसके बाद ब्राह्मणोंके हाथमें जल देकर दोनों हाथोंसे अर्घ्यपात्र उठाकर 'ॐ या दिव्या०' इत्यादि मन्त्रका पाठकर 'अमुक गोत्र मत्पितामह०' इस वाक्यसे पितृ-पात्रसे कुछ अर्घ्योदक पितामहके प्रतिनिधि ब्राह्मणके हाथमें प्रदान करे तथा पवित्रकके सहित अवशिष्ट कुछ जल पिण्डसेचनके लिये रखकर अन्य पात्रसे आच्छादितकर पितृ-ब्राह्मणके


१-इस श्राद्धका भी यथोचित क्रम एवं विस्तृत विवरण श्राद्धपद्धतियोंमें देखना चाहिये।
२-पितरोंके उद्देश्यसे की गयी विधिकी पूर्णताकी प्रार्थना ही 'अच्छिद्रावधारण' है।
३-अर्घ्यपात्रके छिद्ररहित होनेका निश्चय करना ही 'देवपात्राच्छिद्रावधारण' है।