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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 409 of 634

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Page 409
काण्ड ]नित्यश्राद्ध, वृद्धिश्राद्ध एवं एकोद्दिष्टश्राद्धका वर्णन३९९

ब्राह्मणसे अनुज्ञात हो पिण्डके ऊपर श्राद्धकर्ता दुग्धधारा प्रदान करे। फिर पिण्डको हिलाकर पिण्डके समीप रखे अर्घ्यपात्रको सीधा स्थापित कर दे। इसके बाद 'ॐ वाजे वाजे०' मन्त्रसे पिण्डके अधिष्ठाता पितरोंका विसर्जन करे। 'आमा वाजस्य०' आदि मन्त्रसे देव तथा 'अभिरम्यताम्' से पितृ-ब्राह्मणका विसर्जन करके ब्राह्मणसे अनुज्ञा प्राप्तकर गौ आदिको पिण्ड प्रदान करे। इस प्रकार यहाँ श्राद्धविधि बतलायी गयी। इसका पाठ करनेमात्रसे भी पापका नाश होता है। किसी भी स्थानमें उक्त विधिके अनुसार श्राद्ध करनेपर पितरोंको अक्षय स्वर्ग एवं ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है<sup>१</sup>।

(अध्याय २१८)


नित्यश्राद्ध, वृद्धिश्राद्ध एवं एकोद्दिष्टश्राद्धका वर्णन

**श्रीब्रह्माजीने कहा—**अब मैं नित्यश्राद्धका वर्णन करता हूँ। पूर्वमें जिस तरह श्राद्धविधि कही गयी है, उस विधिके अनुसार ही नित्यश्राद्ध करे। विशेषता यह है कि नित्यश्राद्धमें 'ॐ अमुकगोत्राणामस्मत्पितृपितामहानाम् अमुकशर्मणां सपत्नीकानां श्राद्धं सिद्धान्नेन युष्मास्वहं करिष्ये' ऐसा कहकर श्राद्धका संकल्प करना चाहिये। आसन-दानादि सभी कार्य पूर्ववत् करे। इस श्राद्धमें विश्वेदेव वर्जित हैं।

अब मैं वृद्धिश्राद्धका विधान बतलाता हूँ। वृद्धिश्राद्धमें<sup>२</sup> भी श्राद्धकी ही भाँति प्रायः सभी कार्य करना चाहिये। इसके अतिरिक्त जो विशेष है, उसे कहता हूँ। पैदा हुए पुत्रके मुखको देखनेके पहले वृद्धिश्राद्ध करना चाहिये। यह श्राद्ध पूर्वाभिमुख और दक्षिणोपवीती (सव्य) होकर यव, बेर, कुश, देवतीर्थके द्वारा नमस्कार तथा दक्षिणा आदि उपचारपूर्वक करे।

दक्षिण जाँनु<sup>३</sup>को ग्रहण कर विश्वेदेवोंका ब्राह्मणोंमें आवाहन करे। आमन्त्रणसे पूर्व ब्राह्मणोंसे अनुज्ञा प्राप्त करनेके लिये इस प्रकार ब्राह्मणोंसे निवेदन करे—अपने कुलके अमुककी उत्पत्तिके शुभ अवसरपर अपने पितृपक्ष एवं मातृपक्षके पितरोंका श्राद्ध करनेके लिये वसु, सत्य नामके विश्वेदेवोंका आप लोगोंमें आवाहन कर सिद्ध अन्नसे उनका श्राद्ध करना चाहता हूँ। ब्राह्मणोंके द्वारा अपनेमें विश्वेदेवोंके आवाहनकी आज्ञा मिलनेपर उन ब्राह्मणोंमें वसु, सत्य नामके विश्वेदेवोंका आवाहन करना चाहिये। (यहाँ मूल ग्रन्थके अनुसार संस्कृतवाक्योंका ही प्रयोग होना चाहिये।) इसी प्रकार अन्य ब्राह्मणोंमें पितरोंका भी आवाहन करना चाहिये। बादमें 'ॐ विश्वेदेवा स आगत०' इत्यादि मन्त्रसे वसु तथा सत्य नामवाले विश्वेदेवोंका आवाहन कर उन्हें आसन तथा गन्धादि दानकर 'अच्छिद्रावधारण<sup>४</sup>' का वाचन करे। इसके बाद प्रपितामही आदिका अनुज्ञापन, आसनदान, गन्धादि-दान और अच्छिद्रावधारण-वाचन करना चाहिये।

इसी प्रकार पितामही, माता और प्रपितामहकी अनुज्ञा ग्रहणकर आसन, आवाहन और गन्धादि-दान तथा अच्छिद्रावधारण करके प्रपितामह एवं वृद्धप्रमातामह आदिकी अनुज्ञा ग्रहण कर आसन, आवाहन एवं गन्धादिका दान करे। तदनन्तर


१-इस अध्यायसे पार्वणश्राद्ध करनेकी प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिये। श्राद्धकी विधि, सम्पूर्ण मन्त्र एवं क्रमका ज्ञान श्राद्धकी पद्धतियोंसे करना चाहिये।
२-इस श्राद्धको माङ्गलिक, आभ्युदयिक तथा नान्दीमुखश्राद्ध भी कहते हैं।
३-जानु जङ्घाको कहते हैं। बायें जङ्घेको मोड़कर और दाहिने जङ्घेको ऊपरकर बैठनेसे दाहिने जङ्घेपर दाहिना हाथ होता है। यहाँ इसी आसनसे तात्पर्य है।
४-श्राद्धमें समर्पित वस्तुकी पूर्णताका वचन ब्राह्मणोंसे लेना ही 'अच्छिद्रावधारणवचन' है।