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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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Page 392

३८२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

प्रिय तथा अप्रियकी प्राप्तिमें एवं सुख और दुःखमें समान स्थिति, शरीरकी बाह्य और आभ्यन्तरिक शुद्धता, वाणीमें संयम, परमात्माका ध्यान, सभी इन्द्रियोंका निग्रह, धारणा तथा ध्यानमें तत्परता और भावशुद्धि—ये सभी परिव्राजक अर्थात् संन्यासीके धर्म कहे गये हैं।

अहिंसा, प्रिय और सत्यवचन, पवित्रता, क्षमा तथा दया सभी आश्रमों और वर्णोंका सामान्य धर्म है।* जैसा पूर्वमें कहा गया है उसीके अनुसार शास्त्रविहित अपने-अपने धर्मोंका पालन करनेवाले सभी लोग परमगति अर्थात् मोक्षको प्राप्त करते हैं।

हे शौनक! अब मैं प्रातःकाल जागनेसे लेकर रात्रिमें सोनेतक पालन करने योग्य गृहस्थके धर्मका वर्णन करता हूँ। गृहस्थको ब्राह्ममुहूर्तमें निद्राका परित्याग करके धर्म और अर्थका भली प्रकार चिन्तन करना चाहिये तथा शारीरिक कष्ट, उसकी उत्पत्तिके कारण और वेदोंमें कहे गये तत्त्वार्थका भी विचार करना चाहिये। ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर शौचादिक क्रियाओंसे निवृत्त होकर, स्नान करना चाहिये और निरलस भावसे समाहितचित्त होकर संध्योपासन करना चाहिये। दन्तधावन एवं स्नानके अनन्तर ही प्रातःकालिक संध्योपासन करना चाहिये। दिनमें मूत्र और मलका परित्याग उत्तराभिमुख होकर करे। रात्रिमें दक्षिणाभिमुख होकर करे। दोनों संध्याकालमें दिनके समान ही उत्तराभिमुख होकर मल-मूत्रका त्याग करना चाहिये। रात्रि और दिनमें छाया अथवा अन्धकारके कारण यदि दिशाविशेषका ज्ञान नहीं हो पा रहा है, अथवा कोई ऐसा भय उपस्थित है, जिसके कारण मरणकी सम्भावना है तो अपनी सुविधाके अनुसार जिस किसी भी दिशामें मुख करके मल-मूत्रका त्याग किया जा सकता है। गोमय, अग्निके दहकते अंगार, दीमककी बाँबी, जुते हुए खेत, जल, पवित्र स्थान, मार्ग और मार्गमें विद्यमान विधानयोग्य वृक्षकी छायामें न तो मूत्रका परित्याग करना चाहिये और न तो मलविसर्जन ही।

शौचके पश्चात् मिट्टीसे हाथ-पैर आदि साफ करनेके लिये जलके अन्दरसे, देवगृह, बाँबी, चूहेके बिल, दूसरेके उपयोगमें आयी हुई मिट्टीसे अवशिष्ट तथा श्मशान भूमिकी मिट्टी ग्रहण न करे। लघुशंका करनेपर लिंगमें एक बार, बायें हाथमें दो बार और दोनों हाथोंमें दो बार मिट्टी लगाकर जलसे प्रक्षालन करनेपर ही शुद्धि होती है। मलका परित्याग करनेपर लिंगमें एक बार, गुदामें तीन बार, बायें हाथमें दस बार तथा दोनों हाथोंमें सात बार, पैरोंमें पाँच बार और दायें हाथमें दस बार मिट्टीका लेप करके उन्हें जलसे स्वच्छ करे। प्रथम बार उपयोगमें लायी जानेवाली मिट्टीकी मात्रा आधा पसर होनी चाहिये। दूसरे और तीसरे बार जो मिट्टी उपयोगमें आती है उसकी मात्रा आधे पसरकी आधी हो जाती है। जो मनुष्य अस्वस्थताके कारण विष्ठा और मूत्रका परित्याग बैठकर नहीं कर सकता है, वह अभी बतायी गयी शास्त्रीय शुद्धिका आधा भागमात्र अपना सकता है। दिनमें विहित शुद्धिका आधा या चौथाई भाग रात्रिमें शुद्धिके लिये धर्मसम्मत है।

यह शुद्धिकी प्रक्रिया स्वस्थ व्यक्तिको लक्ष्य करके कही गयी है। जो व्यक्ति अस्वस्थताके कारण आर्त है, उसको यथासामर्थ्य ही शुद्धिकी प्रक्रिया अपनानी चाहिये। वसा, शुक्र, रक्त, मज्जा, लार, विष्ठा, मूत्र, कानका मैल, कफ, आँसू, आँखका मैल (कीचड़) और पसीना—ये मनुष्यके शरीरके बारह मल हैं। जबतक मनमें शुद्धताकी अवधारणा न हो जाय, तबतक इनके कारण अनुभवमें आनेवाली


* अहिंसा सूनृता वाणी सत्यशौचे क्षमा दया। वर्णिनां लिंगिनां चैव सामान्यो धर्म उच्यते॥ ( २१३। २२)