Skip to content
SarvaKosh
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

Page 391 of 634

Read in context
Page 391

काण्ड ] सदाचार एवं शौचाचारका निरूपण ३८१


श्रुतिमें कहा गया धर्म परम धर्म है। स्मृति और शास्त्रसे प्रतिपादित धर्म अपर धर्म है। इस प्रकार श्रुति, स्मृति और शिष्टाचारसे प्राप्त धर्म— ये तीन प्रकारके सनातनधर्म हैं।

सत्य, दान, दया, निर्लोभता, विद्या, यज्ञ, पूजा और इन्द्रियदमन—ये शिष्टाचारके आठ पवित्र लक्षण कहे गये हैं। पूर्व कालमें लोगोंके शरीर और इन्द्रिय सत्त्वगुणप्रधान एवं तेजोमय होते थे, अतः जिस प्रकार कमलपत्रपर जल नहीं रुकता उसी प्रकारसे उनके शरीर तथा इन्द्रियोंमें पाप नहीं टिक पाते थे।

सत्त्वगुणके विकासके लिये सनातनधर्म (वर्णाश्रम-धर्म, सदाचार आदि)-के पालनका सर्वाधिक महत्त्व है और इनकी प्रमुखता युगविशेष, स्थानविशेष (भारतवर्ष आदि)-की दृष्टिसे निर्धारित होती है, इसी दृष्टिसे यहाँ इतना निरूपण किया जा रहा है। सत्य, यज्ञ, तप तथा दान—ये धर्मके लक्षण हैं। बिना दिये गये द्रव्यको ग्रहण न करना, दान, अध्ययन, जप, विद्या, धन, तपस्या, पवित्रता, श्रेष्ठ कुलमें जन्म, निरोगता और संसारके बन्धनसे मुक्ति आदिके मूलमें धर्मका आचरण ही प्रधान है। धर्मसे सुख तथा तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति होती है और इस तत्त्वज्ञानसे ही मोक्ष प्राप्त होता है।

शास्त्रोंके अनुसार पालन किये जाने योग्य तथा सनातन कालसे चले आ रहे यज्ञ, अध्ययन और दान—ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यके सामान्य धर्म हैं। यज्ञ कराना, अध्यापन तथा सदाचारवान् विशुद्ध अधिकृत व्यक्तिसे प्रतिग्रह (दान) लेना— ये तीन प्रकारकी वृत्ति (जीविका) मुनियोंने श्रेष्ठ (ब्राह्मण) वर्णके लिये कही है। शस्त्रोपजीवी होना तथा प्राणियोंकी रक्षा करना क्षत्रियवर्णका धर्म है। पशुपालन, कृषिकर्म तथा व्यापार वैश्यवर्णकी वृत्ति कही गयी है। द्विजातिमें भी आनुपूर्वी क्रमसे सेवा करनेका विधान* है। शूद्रका तो एकमात्र कर्तव्य है द्विजातिकी सेवा करना।

गुरुके सान्निध्यमें रहना, अग्निकी शुश्रूषा (अग्निहोत्र) करना तथा स्वाध्याय करना—यह ब्रह्मचारीका धर्म है। वह तीनों संध्याओंमें स्नानकर संध्याकालीन व्रतका पालन करे। स्नानकर्मसे निवृत्त होकर भिक्षाचरण करे। तदनन्तर गुरुके प्रति दत्तचित्त रहकर उनकी ही सेवामें आजीवन लगा रहे। वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी कटिप्रदेशमें मूँजकी मेखला, सिरपर जटा, हाथमें दण्ड धारण करे। वह जटाओंको धारण न करके सिरका मुण्डन भी करा सकता है, किंतु उसको गुरुके आश्रयमें तो रहना ही चाहिये।

अग्निहोत्र-धर्मका पालन तथा कहे गये अपने विहित कर्मोंके अनुसार जीविकाका पालन, पर्वकी रात्रिको छोड़कर अन्य रात्रियोंमें धर्मपत्नीके साथ रति, (यथाशास्त्र) देवता, पितर तथा अतिथिगणोंकी विधिवत् पूजामें अहर्निश संलग्न रहना और श्रुतियों एवं स्मृतियोंमें कहे गये धर्मोंके अनुसार अर्थोपार्जन करना—यह गृहस्थोंका धर्म है।

जटाधारण, अग्निहोत्रका पालन, पृथ्वीपर शयन, मृगचर्मका धारण, वनमें निवास, दूध, मूल, फल तथा नीवारका भक्षण, निषिद्ध कर्मका परित्याग, तीनों संध्याओंमें स्नान, ब्रह्मचर्यका पालन और देवता तथा अतिथिकी पूजा—यह वानप्रस्थीका धर्म है।

सभी प्रकारके आरम्भोंका परित्याग, भिक्षासे प्राप्त अन्नका भोजन, वृक्षकी छायामें निवास, अपरिग्रह, अद्रोह, सभी प्राणियोंमें समानभाव,


*इसका आशय यह है—क्षत्रिय ब्राह्मणकी सेवा करे तथा वैश्य ब्राह्मण और क्षत्रियकी सेवा करे। (वैश्यके द्वारा क्षत्रियकी सेवाकी मर्यादा शास्त्रोंमें निर्धारित है।)