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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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Page 372
३६२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

ही कलसी, क्रोष्ट्रापुच्छा तथा गुहा नामसे कही जाती है। पुनर्नवाको वर्षाभू, कठिल्ल्या और करुणा कहा जाता है। उरुवूक, आम तथा वर्द्धमानक—ये एरण्डके नाम हैं। झषा और नागबलाको एक ही औषधि मानना चाहिये। गोक्षुर अर्थात् गोखरूको श्वदंष्ट्रा कहा गया है। शतावरी नामक औषधि वरा, भीरु, पीवरी, इन्दीवरी तथा वरीके नामसे प्रसिद्ध है।

व्याघ्री, कृष्णा, हंसपदी और मधुस्रवा वृहती नामक औषधिके पर्याय हैं। कण्टकारी या कटेरीको क्षुद्रा, सिंही तथा निदिग्धिका कहा जाता है। वृश्चिका, त्र्यमृता, काली और विषघ्नी सर्पदन्ता नामक औषधिके नाम हैं। मर्कटी, आत्मगुप्ता, आर्षेयी तथा कपिकच्छुका—ये शब्द एक ही अर्थके वाचक हैं। मुद्गपर्णी और क्षुद्रसहा मूंगके तथा माषपर्णी एवं महासहा उड़दके पर्याय हैं। दण्डयोन्यङ्क (दण्डिनी)-को त्यजा, परा और महा नामसे स्वीकार किया गया है।

न्यग्रोध और वट बरगदका तथा अश्वत्थ और कपिल पीपलका वाचक है। प्लक्षको गर्दभाण्ड, पर्कटी तथा कपीतन कहा जाता है। अर्जुन वृक्षका नाम पार्थ, ककुभ और धन्वी है। नन्दीवृक्षको प्ररोही तथा पुष्टिकारी कहते हैं। वंजुल और वेतस एक ही औषधिके वाचक हैं। भल्लातक तथा अरुष्कर भिलावाको कहा जाता है। लोध्र सारवक, धृष्ट और तिरीट नामसे अभिहित है तथा बृहत्फला, महाजम्बु और बालफला एक अर्थके वाचक हैं। जलजम्बु नादेयीका नाम है।

कणा, कृष्णा, उपकुंची, शौण्डी और मागधिका—ये नाम पिप्पलीके हैं। उसके जाननेवाले लोग उस औषधिकी मूलको ग्रन्थिक कहते हैं। ऊषण नामक औषधिको मरिच तथा विश्वा नामक महौषधिको शुण्ठी या सोंठ कहा जाता है। व्योष, कटुत्रय तथा त्र्यूषण इसी औषधिका नाम है। लांगलीको हलिनी और शेयसीको गजपिप्पली कहते हैं। त्रायन्तीका त्रायमाणा तथा उत्साका नाम सुवहा है।

चित्रकका नाम शिखी है। इसको वह्नि तथा अग्नि नामसे भी कहा जाता है। षड्ग्रन्था, उग्रा, श्वेता और हैमवती—ये नाम वचाके हैं। कुटजको शक्र, वत्सक तथा गिरिमल्लिका कहा जाता है। उसके बीजोंका नाम कलिङ्ग, इन्द्रयव और अरिष्ट है। मुस्तक और मेघ नाम मोथाके वाचक हैं। कौन्ती नामक औषधि हरेणुका नामसे कही जाती है। एला और बहुला शब्द बड़ी इलायची तथा सूक्ष्मैला एवं त्रुटि शब्द छोटी इलायचीके वाचक हैं। भार्ङ्गीका नाम पद्मा तथा काँजीका नाम ब्राह्मणयष्टिका है। मूर्वा नामक औषधि मधुरसा और तेजनीका नाम तिक्तवल्लिका है। महानिम्बको बृहन्निम्ब तथा दीप्यकको यवानिका (अजवाइन) कहा जाता है। विडङ्गका नाम क्रिमिशत्रु है। हिंगु अर्थात् हींगको रामठ भी कहते हैं। अजाजी जीरक अर्थात् जीरेका पर्यायवाची शब्द है। उपकुंचिकाको कारवी कहा जाता है। कटुला, तिक्ता तथा कटुरोहिणी—ये तीन कटुकी नामक औषधिके वाचक हैं। तगरका नाम नत और वक्र है। चोच, त्वच तथा वराङ्गक, दारुचीनी नामक औषधि कहलाती है। उदीच्यको बालक (मोथा) तथा ह्रीबेरको अम्बुबालकके नामसे अभिहित किया गया है। पत्रक और दल नाम तेजपत्ताके हैं। आरकको तस्कर कहा जाता है। हेमाभ नामक औषधिका नाम नाग भी है। इसलिये इसको लोग नागकेशर कहते हैं। असृक् तथा काश्मीरबाहीक शब्द कुंकुमके वाचक हैं।

पुर, कुटनट, महिषाक्ष तथा पलङ्कषा शब्द गुग्गुलके वाचक हैं। काश्मीरी और कट्फला श्रीपर्णीको कहा जाता है। शल्लकी, गजभक्ष्या, पत्री, सुरभी तथा श्रवा नाम गजारी औषधिके हैं।