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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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Page 366
३५६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

नागोंका विनाश करनेके लिये उन परमतत्त्वने महाभयंकर गरुडका रूप धारण किया है। विराट्-रूप भगवान् गरुडके दोनों पैर पाताललोकमें स्थित हैं और उनके सभी पंख समस्त दिशाओंमें फैले हुए हैं। सातों स्वर्ग उनके वक्षःस्थलपर विद्यमान हैं। ब्रह्माण्ड उनके कण्ठका आश्रय लेकर अवस्थित है, पूर्वसे लेकर ईशानपर्यन्त आठों दिशाओंको उनका शिरोभाग समझना चाहिये। अपनी तीनों शक्तियोंसे समन्वित सदाशिव इनके शिखामूलमें स्थित हैं। ये तार्क्ष्य (गरुड) साक्षात् परात्पर शिव और समस्त भुवनोंके नायक हैं। त्रिनेत्रधारी, उग्र स्वरूपवाले, नागोंके विषोंके विनाशक, सबको ग्रास बनानेवाले, भीषण मुखवाले, गरुडमन्त्रके मूर्तरूप, कालाग्निके सदृश देदीप्यमान गरुडदेवका अपने समस्त अभीष्ट कर्मोंकी सिद्धिके लिये चिन्तन करना चाहिये। जो मनुष्य न्यास-ध्यानकी विधि सम्पन्न करके इन देवकी पूजा करता है, उसका सब कुछ सिद्ध हो जाता है तथा वह स्वयं गरुडदेवकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। भूत, प्रेत, यक्ष, नाग, गन्धर्व तथा राक्षस आदि तो उसके दर्शनमात्रसे ही भाग जाते हैं। चौथिया आदि ज्वर भी विनष्ट हो जाते हैं। (अध्याय १९७)


त्रिपुराभैरवी तथा ज्वालामुखी आदि देवियोंके पूजनकी विधि

भैरवने कहा—इसके बाद मैं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली त्रिपुरादेवीकी पूजा आदिका वर्णन करूँगा। उसे आप सुनें।

देवीका यथाविधि 'ॐ ह्रीं आगच्छ देवि'—इस मन्त्रसे आवाहन करके 'ऐं ह्रीं ह्रीं'—इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए रेखा करके 'ॐ ह्रीं क्लेदिनी भं नमः'—इस मन्त्रसे उन्हें प्रणाम करे तथा उनकी शक्तियोंके साथ महाप्रेतासनपर विराजमान रहनेवाली देवी त्रिपुराभैरवीका पूजन करे। 'ऐं ह्रीं त्रिपुरायै नमः'—इस मन्त्रसे उन्हें नमस्कार करे। देवीके पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊर्ध्व आदि मुखोंको भी नमस्कार करे। 'ॐ ह्रीं पाशाय नमः', 'क्रों अङ्कुशाय नमः', 'ऐं कपालाय नमः' इत्यादि मन्त्रोंसे उनके पाश, अंकुश, कपाल आदि आयुधोंको नमस्कार करे। त्रिपुराभैरवीदेवीकी पूजामें आठ भैरवों तथा उनके साथ मातृकाओंकी भी पूजा करनी चाहिये। असिताङ्गभैरव, रुरुभैरव, चण्डभैरव, क्रोधभैरव, उन्मत्तभैरव, कपालिभैरव, भीषणभैरव तथा संहारभैरव—ये आठ भैरव हैं। ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री, चामुण्डा तथा अपराजिता (दुर्गा)—ये आठ मातृकाएँ हैं।

पूजकको चाहिये कि वह 'ॐ कामरूपाय असिताङ्गाय भैरवाय नमो ब्रह्माण्यै'—इस मन्त्रसे पूर्व दिशामें कामरूप असिताङ्गभैरव और देवी ब्रह्माणीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। उसके बाद 'ॐ स्कन्दाय नमः, रुरुभैरवाय नमः, माहेश्वर्यै नमः' मन्त्रोंद्वारा दक्षिण दिशामें स्कन्ददेव, रुरुभैरव और देवी माहेश्वरीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। 'ॐ चण्डाय नमः, कौमार्यै नमः' इन मन्त्रोंसे पश्चिम दिशामें चण्डभैरव तथा देवी कौमारीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। तत्पश्चात् 'ॐ उल्काय नमः, ॐ क्रोधाय नमः, ॐ वैष्णव्यै नमः'—इन मन्त्रोंसे उत्तर दिशामें उल्कादेव, क्रोधभैरव और देवी वैष्णवीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। 'ॐ अघोराय नमः, ॐ उन्मत्तभैरवाय नमः, ॐ वाराह्यै नमः'—इन मन्त्रोंसे अग्निकोणमें अघोरदेव, उन्मत्तभैरव और देवी वाराहीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। तदनन्तर 'ॐ साराय कपालिने भैरवाय नमः,