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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 365 of 634

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Page 365

काण्ड ] विषहरी गारुडी विद्या तथा भगवान् गरुडके विराट् स्वरूपका वर्णन ३५५


ओषधियोंको पीसकर तैयार किये गये सुरमेके समान कान्तिवाले वृत्ताकार बिन्दुयुक्त वायुमण्डलमें वायुका ध्यान करे। आकाशमण्डलका चिन्तन क्षीरसागरमें उठती हुई लहरोंके समान आकारवाले, शुद्ध स्फटिकके सदृश आभावाले तथा सम्पूर्ण संसारको अपनी अमृतमयी रश्मियोंसे आप्लावित करनेवालेके रूपमें करे।

जो अष्ट महानाग कहे गये हैं, उनमेंसे वासुकि और शंखपाल नामक नाग पृथ्वीमण्डलमें स्थित रहते हैं। कर्कोटक तथा पद्मनाभ नामक दो नागोंका वास वरुणमण्डल (जलमण्डल)-में है। कुलिक और तक्षक नामक नाग अग्निमण्डलमें निवास करते हैं। महापद्म तथा पद्म नामक नाग वायुमण्डलमें रहते हैं। साधकको इन नागोंका ध्यान करके पृथ्वी आदि पञ्चभूत-तत्त्वोंका न्यास करना चाहिये। अंगुष्ठसे लेकर कनिष्ठापर्यन्त अंगुलियोंमें अनुलोम और विलोम-रीतिसे न्यास करना चाहिये। अंगुलियोंकी पर्वसंधियोंमें जया तथा विजया नामक दो शक्तियोंका न्यास करना चाहिये।

पुनः अपने शरीरमें शिवषडङ्गन्यास, पञ्चतत्त्वन्यास तथा व्यापक-न्यास करे। देवताके नामके आदिमें 'प्रणव' तथा अन्तमें 'नमः' प्रयुक्त करे, यह विधि स्थापन एवं पूजनादिक-मन्त्रके रूपमें बतलायी गयी है। देवताके नामके आद्य अक्षर भी मन्त्ररूप होते हैं। आठों नागोंके जो मन्त्र हैं, वे उनके संनिधानको प्राप्त करानेवाले हैं। पञ्चतत्त्वोंके साथ आदिमें 'ॐ' और अन्तमें 'स्वाहा' लगानेसे मन्त्र बन जाते हैं। ऐसा करनेसे ये मन्त्र साक्षात् गरुडके समान साधकके सभी अभीष्ट कर्मोंको सिद्ध करनेवाले हो जाते हैं।

स्वर-वर्णोंसे करन्यास करके पुनः उन्हींसे शरीरके अन्य अङ्गोंमें भी न्यास करना चाहिये। तदनन्तर आत्मशुद्धिकारक उद्दीप्त प्राणशक्तिका चिन्तन करना चाहिये। इसके बाद साधकको अमृतकी वर्षा करनेवाले बीजका ध्यान करना चाहिये। इस प्रकार आप्यायन करके साधकको अपने मस्तिष्कमें आत्मतत्त्वका चिन्तन करना चाहिये। तत्पश्चात् स्वर्णके समान कान्तिवाली, समस्त लोकोंमें फैली हुई तथा लोकपालोंसे समन्वित पृथ्वीका दोनों पैरोंमें न्यास करना चाहिये।

बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि वह भगवती पृथ्वीदेवीका अपने सम्पूर्ण देहमें न्यास करे। इसी प्रकार अपने देहके अङ्गोंमें शेष चार मण्डलों तथा उनमें स्थित देवोंका न्यास करे। इस प्रकार पञ्चभूत-तत्त्वोंका न्यास करके यथाक्रम आठ नागोंका न्यास-ध्यान करना चाहिये।

इसके बाद स्थावर और जंगम प्राणियोंके विष-दोषका विनाश करनेके लिये पक्षिराज गरुडका ध्यान इस प्रकार करना चाहिये—गरुडदेव अपने दोनों पैरों, पंखों तथा चोंचद्वारा पकड़े हुए कृष्णवर्णवाले नागोंसे विभूषित हैं। ग्रह, भूत, पिशाच, डाकिनी, यक्ष, राक्षसका उपद्रव होनेपर विषधर नागोंसे घिरे हुए भगवान् शिवका अपने शरीरमें न्यास करना चाहिये।

यथाविधि ध्यान-पूजन आदि कृत्योंको करके साधकको सभी कर्मोंमें सिद्धि प्राप्त करनेके लिये अभीष्ट रूप धारण करनेवाले, मनपर विजय प्राप्त करनेमें समर्थ, सम्पूर्ण संसारको अपने रसमें आप्लावित करनेवाले एवं सृष्टि तथा संहारके कारण, अपने प्रकाशपुञ्जसे उद्दीप्त और समस्त ब्रह्माण्डमें व्याप्त, दस भुजाओं और चार मुखोंवाले, पिङ्गलवर्णके नेत्रवाले, हाथमें शूल धारण करनेवाले, भयंकर दाँतवाले, अत्यन्त उग्र, त्रिनेत्र तथा चन्द्रचूडसे विभूषित और गरुडस्वरूप भैरवका चिन्तन करना चाहिये।

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