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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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Page 339

काण्ड ] ज्वर-चिकित्सा ३२९


एक प्रस्थ घृतको अग्निपर सिद्ध करना चाहिये। इस घृतपाकके प्रयोगसे प्राणियोंका लँगड़ापन, बौनापन, लुंजता, बधिरता, व्यंगदोष और कुष्ठरोग विनष्ट हो जाता है। वायुदोषके कारण जिनका शरीर दुर्बल हो गया है, जो मैथुनमें अशक्त हैं, वृद्धावस्थाके कारण जो जर्जर शरीरवाले हो गये हैं, आध्मान नामक रोगके कुप्रभावसे जिनके मुख शुष्क हो गये हैं, उनके उन सभी विकारोंका यह घृत-पदार्थ विनाशक है। जिन प्राणियोंके चर्म, शिरा और स्नायु-तन्त्रिकाओंमें विकृत वायु-समूह प्रविष्ट होकर रोगका रूप धारण कर चुका है, वह सब इस सिद्ध तेलके सेवनसे नष्ट हो जाता है। इस तेलका नाम नारायणतेल है। इस रोगविनाशक तेलकी सिद्धिका विधान स्वयं भगवान् विष्णुने बताया था, इसीलिये इस सिद्ध तेलका नाम उन्हींके नामपर पड़ा है। इन्हीं औषधियोंसे पृथक्-पृथक् अथवा मिश्रण-रूपमें घृत एवं तैलपाक बनाना चाहिये।

शतावरी, गुडूची, चित्रक, बिजौरा नीबूका रस अथवा कण्टकारीके रसादिसे समन्वित निर्गुण्डीका रस या पुनर्नवा और चमेली अथवा त्रिफलाके साथ अडूसा या ब्राह्मी, एरण्ड, भृंगराज, कुष्ठ, मूसली, दशमूल और खदिरकी घिसकर बनायी गयी वटी, वटिका, मोदक या चूर्ण सभी रोगोंको दूर करनेवाला है। घृत, मधु, जल, शर्करा, गुड़, नमक तथा सोंठ, काली मिर्च अथवा पिप्पलीके साथ सेवन करनेसे सभी रोगोंमें यथोचित लाभ होता है। इन औषधियोंका योग सर्व-रोगविनाशक है।

चित्रक, मन्दार और निसोत अथवा अजवाइन तथा कनेर या सुधा (गुडूची), बाला (चमेली), गणिका (गनियारी), सप्तपर्णी (छितवन), सुवर्चिका (पित्तपापड़ा) और ज्योतिष्मती (मालकँगनी) नामकी औषधियोंको एकत्र करके विद्वान्को उनका तैल पाक सिद्ध करना चाहिये। इस योगसे सिद्ध तेलका प्रयोग भगंदर-रोगमें करना चाहिये। शोधन, रोपण तथा सर्ववर्णकारक चित्रकादिक जो महातेल हैं, वे सभी प्रकारके रोगोंका निवारण करते हैं।

अजमोदा, सिन्दूर, हरताल, हल्दी, दारुहल्दी, यवक्षार, छज्जी, समुद्रफेन, अदरक, सरलद्रव, इन्द्रायण, अपामार्ग, केला तथा तिन्दुकको समान भागमें लेकर सरसोंका तेल बकरीके मूत्र तथा गोदुग्धको मिलाकर मन्द-मन्द अग्निकी आँचपर पाक करना चाहिये। इस सिद्ध तैल पाकका नाम अजमोदादि-तेल है। यह गण्डमाला नामक रोगको दूर करता है। विद्वान् व्यक्तिको सबसे पहले इस गण्डमाला नामक रोगमें होनेवाली फुंसियोंको पकाना चाहिये। तदनन्तर उनका शोधन करके इसी अजमोदादि तेलसे घावोंको भरते हुए उसमें कोमलता लानेका प्रयास करे। (अध्याय १७४)


ज्वर-चिकित्सा

श्रीहरिने कहा— हे शंकर! सभी ज्वरोंमें सबसे पहला कार्य लंघन है। उसके बाद क्वाथ, उदकपान तथा वातशून्य स्थानका सेवन करना चाहिये।

हे ईश्वर! अग्निसे तथा स्वेदनकी क्रियाओंको करनेसे सभी ज्वर विनष्ट हो जाते हैं। गुडूची और मोथेका क्वाथ वातज्वर-विनाशक है। दुरालभा* अर्थात् धमासा नामक औषधिके घृतका पान


* च०सू० २५, भा०प्र०, च०द०।