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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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Page 338
३२८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

जठराग्निदीपन तथा वातदोषसे घिरे हुए प्राणियोंको स्नेहयुक्त औषधि एवं क्वाथोंका प्रयोग करना चाहिये।

इसके बाद जब प्राणीके सिरमें रोग हो गया हो तो चिकित्सा-शास्त्रके नियमानुसार सिरकी अपेक्षित शिराओंके समूहको गर्म करके प्राणीको धीरे-धीरे सिरका मर्दन करना चाहिये। स्नेह, क्वाथ और वटिका आदिके रूपमें प्रयुक्त औषधियोंकी उत्तम, मध्यम तथा अधम—ये तीन मात्राएँ मानी गयी हैं, जिनमें उत्तम मात्रा एक पल अर्थात् आठ तोला (९६ ग्राम), मध्यम मात्रा तीन अक्ष अर्थात् छः तोला (७२ ग्राम) और अधम मात्रा अर्ध पल अर्थात् चार तोला (४८ ग्राम) होती है। घृतपाक-सेवनमें गुनगुना तथा तैलपाक-सेवनमें शीतल जलका प्रयोग होना चाहिये। स्नेह (सहरई) पित्तविकार तथा तृष्णाजन्य दोषमें मनुष्यको गुनगुना जल पीना चाहिये।

शरीरमें जठराग्निके प्रबल होनेपर प्राणीको वातानुलोम, स्निग्धभाव होनेपर जठराग्निका दीपन, रूक्षभाववाली स्थितिके होनेपर स्नेहन तथा अत्यधिक स्निग्धताके होनेपर रूक्षता उत्पन्न करनेका प्रयास करना चाहिये। साँवाँ, कोदो आदि रूक्ष अन्न, तक्र, तिलकुट तथा सत्तूके अनपेक्षित प्रयोगसे वात तथा कफ-रोगमें अथवा वात-रोगमें स्वेदन-क्रिया करनी चाहिये। किंतु अत्यन्त स्थूल, रूक्ष, दुर्बल और मूर्च्छित व्यक्तिमें यह स्वेदन-क्रिया नहीं करनी चाहिये।
(अध्याय १७३)


ब्राह्मीघृत आदि स्नेहपाकोंकी निर्माण-विधि तथा विविध रोगोंमें उनका उपचार

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! अब मैं रोगोंको दूर करनेवाले घृत और तैलादि पदार्थोंके विषयमें बताऊँगा, उसे आप सुनें।

शंखपुष्पी, वच, सोमा, ब्राह्मी, ब्रह्मसुवर्चला, अभया (हरीतकी), गुडूची (गिलोय), अटरूषक (अडूसा) तथा वागुजी (वकुची) नामक इन औषधियोंके रसको एक-एक अक्ष अर्थात् दो-दो तोला लेकर उनसे एक प्रस्थ अर्थात् चार सेर घृतका पाक सिद्ध करना चाहिये। उसमें एक प्रस्थ कण्टकारीका रस, एक ही प्रस्थ दूधका मिश्रण भी करना चाहिये। इस घृतपाकका नाम ब्राह्मीघृत है। यह स्मरण और मेधा-शक्तिका अभिवर्धक होता है।

त्रिफला, चित्रक, बला, निर्गुण्डी (सिन्धुवार), नीम, वासक (अडूसा), पुनर्नवा, गुडूची, बृहती और शतावरी नामक इन औषधियोंके रससे सिद्ध घृतपाक सभी रोगोंका विनाशक है।

बलाके रससे बने हुए क्वाथमें आधा आढक अर्थात् दो सेर तिलका तेल पकाना चाहिये। इस क्वाथपाकके साथ मुलेठी, मजीठ, चन्दन, नीलकमल, लालकमल, छोटी इलायची, पिप्पली, कुष्ठ, दारचीनी, बड़ी एला (कपित्थकी छाल), अगरु, केसर, अश्वगन्धा तथा जीवन्तीका कल्क और एक आढक अर्थात् चार सेर दूध मिलाना चाहिये। इस पाकको अग्निकी धीमी आँचमें सिद्ध करके एक रजत-पात्रमें रखना चाहिये। यह तैलपाक समस्त वात तथा धातुरोगोंका नाशक है। इस तैलपाकके सेवनसे कफजन्य क्षयरोग भी विनष्ट हो जाता है। इसका नाम राजवल्लभ है।

एक प्रस्थ शतावरीका रस, एक प्रस्थ दूध, एक-एक कर्ष शतपुष्पी, देवदारु, जटामांसी, शिलाजीत, बला, चन्दन, तगर, कुष्ठ, मैनसिल और मालकँगनी नामक औषधियोंका रस लेकर