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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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Page 313

काण्ड ] वातरक्त-निदान ३०३

जंघाओंकी हड्डी शिथिल पड़ जाती है। उस दोषके प्रभावके कारण रोगीका वह अङ्ग श्यामवर्णका हो जाता है। उसमें जड़ता आ जाती है। रोगी तन्द्रा, मूर्च्छा, अरुचि और ज्वरके उपद्रवोंसे ग्रस्त हो उठता है। इस रोगको ऊरुस्तम्भ कहते हैं। दूसरे लोग इसको बाह्यवात भी कहते हैं।

वायु और रक्त दोनोंके कुपित होनेसे जानुमें (घुटनोंके मध्य) जो शोथ उत्पन्न होता है, वह महाभयंकर पीड़ादायक रोग है। इसमें शोथ सियारके सिरके समान स्थूल माना गया है, इसलिये इसको क्रोष्टुकशीर्षके नामसे कहा जाता है। जब ऊँचे-नीचे पीड़ादायक विषम स्थानपर पैर रखनेसे अथवा अत्यन्त परिश्रमसे वायु कुपित होकर गुल्फ (टखने)-में आश्रित हो जाता है, तो उसे वातकण्टक रोग कहा जाता है।

जब पार्ष्णि-भागके सम्मुख अँगुलीकी शिराओंको प्रकुपित वायु पीड़ा उत्पन्न करते हुए पाँवोंकी गमनशक्ति नष्ट कर देती है, तब उसे गृध्रसी रोग कहते हैं। कफ और वायुके प्रकुपित होनेसे जब दोनों पैर झुनझुनाने लगते हैं और सुन्न भी हो जाते हैं, तब उस दोषको पादहर्ष कहा गया है। पित्त तथा रक्तसे संश्रित वात प्राणीके दोनों पैरोंमें दाह उत्पन्न कर देता है, विशेष रूपसे वैसी अवस्था अधिक चलनेसे ही आती है। वात-दोषमें इस दोषभेदको पाददाह नामसे सम्बोधित किया गया है।
(अध्याय १६६)


वातरक्त-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! अब मैं आपसे वातरक्त-निदान बतलाऊँगा, उसे सुनें।

प्रायः स्वास्थ्य-विरुद्ध भोजन तथा क्रोध करनेवाले, दिनमें सोने और रात्रिमें जागरण करनेवाले तथा सुकुमार एवं मिथ्या आहार-विहार करनेवाले, स्थूल शरीरवाले और सुखीजनोँका रक्त वृद्धवातसे प्रकुपित हो जाता है। चोट लगनेसे अथवा वमन एवं विरेचन आदिद्वारा शुद्ध न होनेवाले मनुष्योंका रक्त दूषित हो जाता है। वात-दोष पैदा करनेवाले एवं शीतल पदार्थोंके सेवनसे वायु-वृद्धि होती है, वह क्रुद्ध होकर विमार्गगामी हो जाता है। इस प्रकारसे प्रवहमान वह वायु रक्त-स्रोतोंसे अवरुद्ध होकर पहले रक्तको ही दूषित करता है। तदनन्तर मांसादिक अन्य धातुओंको भी दूषित करता है। पहले गुदाभागको पीड़ितकर बादमें यह सम्पूर्ण शरीरमें फैल जाता है। इस वात-दूषित रक्तको वातरक्त कहा जाता है। विशेष रूपसे यह दोष वमनादि उपद्रवों तथा पाँव लटकाकर बैठनेवाली सवारी आदिसे होता है।

कुष्ठरोगके जो पूर्वरूप होते हैं, प्रायः वे ही वातरक्त-रोगके भी होते हैं। इस रोगके होनेपर घुटना, जंघा, ऊरु, कटि, स्कन्ध, हाथ, पैर और संधि-स्थानोंमें खुजली, स्फुरण, सूचिकाभेद, गुरुता और इन्द्रियसुप्तताके दोष होते हैं। ये दोष बार-बार उत्पन्न होकर शान्त हो जाते हैं और पुनः उभर भी जाते हैं।

कभी दोनों पैरोंके मूलभागमें आश्रय लेकर अथवा कभी दोनों हाथोंके मूलमें स्थित होकर, यह कुपित वातरक्त-दोष प्राणीके सम्पूर्ण शरीरको वैसे ही परिव्याप्त कर लेता है, जैसे चूहेका विष कुपित होकर धीरे-धीरे पूरे शरीरमें व्याप्त हो जाता है। वह वातरक्त सर्वप्रथम रोगीके चर्म-


१-सु०नि०अ० १; वा० नि० १५; च०चि० २८। २-च०चि० २९; सु० चि० १; अ०स० नि०अ० १६।