Skip to content
SarvaKosh
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished634 pages

Page 312 of 634

Read in context
Page 312

३०२ संक्षिप्त गरुड़पुराण [ आचार-

टेढ़ा हो जाता है। वह ऊँचे स्वरमें अट्टहास करता
है तथा किसी ओर अपने नेत्रोंको एकटक लगाकर
ध्यानमग्न होकर देखता है। उसके बाद उसी
दोषसे रोगीकी वाक्शक्ति शिथिल पड़ जाती है,
नेत्रोंमें स्तब्धता छा जाती है, दाँत किटकिटाते हैं,
स्वरभंग हो जाता है, बहरापन तथा अन्धत्वका
दोष आ जाता है। इन दोषोंके अतिरिक्त गन्धकी
अज्ञानता, स्मृतिध्वंस, भय, श्वास, थूक, पार्श्वभेद,
एक नेत्रकी शक्तिका ह्रास, दाढ़के ऊर्ध्वभागमें,
शरीरके आधे भागमें या नीचेके भागमें प्रबल
वेदना होती है। कुछ लोग इसे अर्दित और कुछ
एकाङ्गदोष कहते हैं।

जब प्रकुपित वायु रक्तका आश्रय लेकर
मूर्धमें स्थित शिराओंको रूक्ष, शूलयुक्त और
कृष्णवर्णका कर देता है, तब उसे शिरोग्रह दोष
कहते हैं और यह असाध्य है।

जब प्रकुपित वायु शरीरको अपने अधिकारमें
करके उसमें निहित शिराओं तथा स्नायु-तन्त्रिकाओंको
अपने अधिकारमें कर लेता है और उनमें अवरोध
उत्पन्न करके वह रोगीके शरीरके एक पक्ष अथवा
अन्य किसी विशेष भागपर प्रहार करता है, जिससे
वह भाग चेतना-शून्य अथवा अकर्मण्य हो जाता
है, तब उस दोषको लोग पक्षाघात कहते हैं। कुछ
लोगोंने तो उसको एकाङ्ग या अर्धाङ्ग रोग और
कुछ अन्य लोगोंने कक्षव्याधिके नामसे स्वीकार
किया है। परंतु सम्पूर्ण शरीरमें प्रकुपित वायुका
आश्रय होनेपर सर्वाङ्गरोध (सर्वाङ्ग-पक्षाघात)
और जकड़न नामक रोग होता है।

जो पक्षाघातरोग केवल वातके कारण होता है,
वह अत्यन्त कष्ट-साध्य है। जब वह वातरोग
पित्तादि अन्य दोषोंके संयोगसे होता है, तब कष्ट-
साध्य तथा जो वातरोग धातुओंके क्षय हो जानेसे
होता है, वह असाध्य होनेसे वर्ज्य है।

कफसे युक्त वात जब आमाशयमें अवरुद्ध हो
जाता है, तब उस समय रोगीके शरीरको वह
जकड़ देता है। उसके कारण रोगीका शरीर डंडेके
समान सीधा हो जाता है। इसीलिये इसको
दण्डापतानक कहा जाता है। यह सम्पूर्ण दोषोंसे
समन्वित होनेपर निश्चित ही असाध्य बन जाता है।

स्कन्ध-प्रदेशके मूलभागसे उठा हुआ प्रकुपित
वायु उसकी शिराओंको संकुचित करके बाहुओंकी
स्पन्दन-शक्तिको नष्ट कर देता है, उसे अवबाहुक
रोग कहते हैं। भुजाओंके पृष्ठभागसे होकर प्रत्येक
अँगुलीके तलप्रदेशतक जो एक मोटी नाड़ी जाती
है, उसका नाम कण्डरा है। उसमें कुपित हुआ
वात उसके कर्म-सामर्थ्यको समाप्त कर देता है,
उसको विषूची कहा जाता है। रोगीके कटिप्रदेशमें
रहनेवाला वायु जब जंघाप्रदेशतक जाता है, तो
अपनी उस मोटी कण्डरा नाड़ीको आक्षिप्त कर
देता है अर्थात् उसे जकड़ लेता है, इससे रोगी खञ्ज
(लँगड़ा) हो जाता है। जब दोनों जंघाओंकी
नसोंको जकड़कर दोनों पैरोंकी कण्डराएँ आक्षिप्त
हो उठती हैं, तब उस रोगको पङ्गु कहा जाता है।
जब रोगी चलनेमें काँपने लगता है और खञ्जन
पक्षीकी भाँति लँगड़ाते हुए चलता है, उसके
संधि-बन्धन शिथिल पड़ जाते हैं तो उस दोषको
कलायखञ्ज नामक रोग मानना चाहिये।

जीर्ण या अजीर्ण-अवस्थामें शीतल, उष्ण,
द्रव-पदार्थ, शुष्क, गुरु, स्निग्ध भोज्य-पदार्थका
सेवन, अधिक परिश्रम, संक्षोभ, शैथिल्य तथा
अधिक जागरण करनेसे वात-कफयुक्त मेद अत्यधिक
मात्रामें संचित होकर पित्तका पराभव करके
शरीरको परिव्याप्त कर लेता है।

अन्तःश्लेष्मके द्वारा जंघाप्रदेशकी हड्डियोंके
दोष-समन्वित होनेपर स्तम्भन-रोग उन्हें ग्रसित
करता है। उस समय शीत-वात-दोषके प्रभावसे