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Read in contextकाण्ड ] प्रमेहरोग-निदान २८३
शुक्र मूत्र-क्षरण होनेसे पहले अथवा बादमें लिंगसे बाहर आता है। इसका स्वरूप भस्ममिश्रित जलके समान होता है। उसको वैद्यकमें मूत्रशुक्रके नामसे जाना जाता है।
जब रूक्षता और दुर्बलताके कारण वातजन्य दोषसे उदावर्त उपद्रव होता है अर्थात् शरीरके अंदर विद्यमान अपानवायु व्यानवायुसे घिर जाता है अर्थात् मलावरोध हो उठता है तो उस कालमें वह मल-मूत्र स्रोतकी संसृष्टिसे संयुक्त हो जाता है। इसमें मूत्र बूँद-बूँद ही होता है और इस टपकनेवाले मूत्र-बिन्दुओंमें एक दुर्गन्ध-सी रहती है। ऐसे रोगको मूत्रविघातके नामसे स्वीकार किया जाता है।
पित्त², व्यायाम, तीक्ष्ण और अम्लाहार तथा आध्मान (पेट फूलने) अथवा अन्य विकृतियोंके द्वारा शरीरके आभ्यन्तरिक भागमें बढ़ा हुआ पित्त-वायु-विकार वस्तिभागमें दाह उत्पन्न कर देता है, जिसके कारण रक्तयुक्त मूत्र निकलता है अथवा उष्ण रक्त ही उसकी मूत्र-प्रवाहिकासे बार-बार कष्टपूर्वक गिरता है। इस प्रकारके कष्टको उत्पन्न करनेके कारण लोगोंने उस रोगको उष्णवातकी संज्ञा दी है।
रूक्षाहार तथा परिश्रम करनेसे श्रान्त रोगीका पित्त और वायु कुपित हो उठता है। वह उसके वस्तिभागमें मूत्रावरोध, पीड़ा, क्षय और जलन उत्पन्न कर देता है। उस लक्षणसे युक्त मूत्राघात-कष्टको मूत्रक्षय कहा गया है।
यदि कुपित वायुके द्वारा पित्त और कफ अथवा इन दोनोंको संक्षुब्ध कर दिया जाता है तो उस समय प्राणीको जलन, कष्टसाध्य मूत्र-निर्गमन होता है। उसके मूत्रका वर्ण पीला, रक्त तथा श्वेत हो जाता है और उसमें गाढ़ापन भी आ जाता है। वस्तिभागमें दाहभरी जलन होती है। जो मूत्र निकलता है, उसका वर्ण सूखे गोरोचन तथा शंख-चूर्णके समान होता है। इस रोगको कृच्छ्रमूत्रसाद कहते हैं। इस प्रकार विस्तारपूर्वक मूत्रमें होनेवाले रोगोंको भी मैंने बता दिया है। (अध्याय १५८)
प्रमेहरोग-निदान
धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! अब मैं आपको प्रमेह³-रोगोंका निदान सुनाऊँगा, उसे सुनें।
प्रमेह बीस प्रकारके होते हैं। उनमें दस प्रमेह कफजन्य, छः प्रमेह पित्तजन्य और चार प्रमेह वातजन्य हैं। इन सभीमें मेद, मूत्र और कफकी संसृष्टि होती है।
प्रमेहका सबसे पहला प्रकार हारिद्रमेह है। इस प्रमेहके होनेपर रोगीको कटु, रसमिश्रित मूत्र हल्दीके समान मल-मूत्र होता है। इस प्रमेहका दूसरा प्रकार मंजिष्ठामेह है। मंजिष्ठामेहके होनेपर मंजिष्ठ (मजीठ)-वर्णके जलके सदृश होता है। इसका तीसरा प्रकार है रक्तमेह। इस रक्तमेहके होनेपर रक्तवर्णकी आभावाला कच्चे मांसकी गन्धसे समन्वित उष्ण तथा लवण-तत्त्व-मिश्रित मूत्र होता है। वसामेहमें चर्बी-मिला हुआ मूत्र अथवा केवल चर्बी ही बार-बार निकलती है। वसायुक्त मज्जामेही व्यक्ति वर्ण और गन्धमें समानता रखनेवाले मज्जा-तत्त्वसे संश्लिष्ट मूत्रत्याग करता है।
जब प्राणी मतवाले हाथीके समान असंयमित वेगसे अधिक समयतक मूत्र निकालता है, जिसके साथ एक चिपचिपा पदार्थ भी आता है और यह यदा-कदा बीच-बीचमें रुक भी जाता है तो उस रोगीको हस्तिमेही मानना चाहिये। हस्तिमेह प्रायः वृद्धावस्थामें होता है। जब व्यक्तिको मधुके समान
१-सु०उ० ५७। २-सु०अ० ८५। ३-च०चि० ७, वा० नि० १० ।