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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 292 of 634

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Page 292
२८२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

अनुलोम गति होती है तो यह मूत्रके साथ बाहर निकल जाती है अथवा मूत्रके साथ प्रतिलोम-अवस्थामें अंदर ही रुक जाती है। क्रुद्ध हुआ वायु वस्तिभागके मुखको रोककर आमाशयके जलस्रोतसे नीचे आनेवाले उस मलिन जलको एकत्र कर देता है। इस मूत्रके संचित होनेसे वस्तिभागमें विकारकी उत्पत्ति होती है, रोगीको कष्ट होता है और उस भागमें खुजलाहट होने लगती है।

रोगीके शरीरमें विक्षुब्ध वह वायु वस्तिभागके मुखको विधिवत् ढककर मूत्रावरोध उत्पन्न करता है तथा वस्तिको अपने स्थानसे हटाता हुआ उल्टा या इधर-उधर करके वस्तिमें विकृति उत्पन्नकर गर्भ-जैसा स्थूल (मोटा) बना देता है एवं उस स्थानको पीड़ित करता है। वहाँ उसके कारण जलन होती है। उसमें स्पन्दन होने लगता है और कूल्होंमें भी पीड़ा प्रारम्भ हो जाती है। रोगीका मूत्र बिन्दुवत् टपकता है, वह अपने सही वेगसे नहीं निकलता। वस्तिभागमें पीड़ा बनती रहती है। दबानेपर मूत्र धारा-रूपमें निकलता है। वायुजन्य इस रोगको वातवस्तिके नामसे स्वीकार किया गया है।<sup>१</sup>

वातवस्तिके दो भेद हैं—पहला वस्तिके मुखको रोकनेवाला दुस्तर कहलाता है और दूसरा दुस्तरतर। वस्तिके मुखको ऊपर करनेवाला अत्यन्त कृच्छ्रसाध्य है, क्योंकि इसमें वायुका विशेष प्रकोप होता है। मलमार्ग तथा वस्तिभागके बीच स्थित वायु अष्ठीलाकृति अर्थात् गोलककडी या अँठुलीके समान घनीभूत शक्तिशाली, मज़बूत ग्रन्थि (गाँठ) उत्पन्न करता है, जिसके कारण इसको वाताष्ठीला नामसे अभिहित किया गया है। इस रोगमें वायु रोगीके अपानवायु तथा मल-मूत्रको अवरुद्ध कर देता है। वस्तिभागमें विद्यमान कुपित वायु कुण्डली मारकर तीव्र पीड़ाको जन्म देता है। वहाँ मूत्रको रोककर वह उसमें अत्यधिक स्तम्भनका दोष उत्पन्न करता है। ऐसी अवस्थामें रोगीको बहुत ही अल्प मात्रामें बार-बार मूत्र होता है तथा ऐसी अवस्थामें रोगी मूत्रको अधिक देरतक रोकनेमें असमर्थ रहता है। ऐसे रोगको वातकुण्डैलिका<sup>२</sup> कहते हैं। जब रोगी रुके हुए मूत्रको निकालनेमें पीड़ाका अनुभव करता है तो वह निरुद्ध मूत्र-कृच्छ्ररोग है अथवा मूत्रको अधिक कालतक रोकनेके पश्चात् यदि उसका वेग नहीं आता है या रुक-रुककर आता है और कुछ कष्ट होता है तो उसको मूत्रातीत कहा जाता है।

मूत्रके वेगको रोकनेसे प्रतिहत हुआ मूत्र अथवा वायुसे पीछेको घुमाया हुआ मूत्र जब नाभिके नीचे उदरमें भर जाता है, तब वह तीव्र वेदना और आध्मान पैदा करता है और मलका संग्रह करता है। इसे मूत्रजठर कहते हैं। मूत्रके दोषसे अथवा कुपित वायुके द्वारा आक्षिप्त हुआ थोड़ा-सा मूत्र वस्ति, नाल, उपस्थकी मणिमें स्थित होकर थोड़ा-थोड़ा दर्द करता हुआ अथवा बिना दर्दके ही निकलता है, इसे मूत्रोत्सर्ग या मूत्रजठर कहते हैं।

अबाधगतिसे<sup>३</sup> मूत्रोत्सर्ग होना प्राणीके श्रेष्ठ अण्डकोषोंपर निर्भर होता है। एकाएक रुका हुआ मूत्र निकल जानेपर अन्तःकरण और मुख शुष्क हो जाता है। अधिकाधिक या अल्प मात्रामें प्राणीको प्यास लगती है। वस्तिके आभ्यन्तर भागमें मूत्रावरोधके कारण अश्मरीके सदृश एक ग्रन्थि पड़ जाती है, जिसको मूत्रग्रन्थि कहते हैं। मूत्र-रोग<sup>४</sup>-ग्रसित रोगीका जब स्त्रीके साथ सहवास होता है तो उस समय वायुके द्वारा ही स्त्रीके गर्भाशयमें शुक्र पहुँच जाता है, किंतु स्थान-विशेषसे निकला हुआ वह


<sup>१</sup> मा०नि० मूत्राघात प्र० ४।
<sup>२</sup> मा०नि०मूत्राघात प्र० २, ३, श्लोक ७, ८।
<sup>३</sup> सु०उ० ८५, अ०हृ०नि०अ० ९।
<sup>४</sup> सु०उ०तं०अ० ५८।