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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 228 of 634

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Page 228
२१८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

उस दिन रात्रिमें जागरण करे तथा गीत-वाद्यादिसे आमोद-प्रमोद करते हुए प्रभातकालमें उन देवकी फिरसे पूजा करके ब्राह्मणको शय्या, पात्र, छत्र, वस्त्र तथा पदत्राणके लिये जूतेका दान देकर भक्तिपूर्वक गौ और ब्राह्मणको भोजन देकर मनुष्यको कृतकृत्य होना चाहिये। व्रतकी समाप्तिपर उद्यापन करना चाहिये। ऐसा करनेसे व्रती लक्ष्मी, पुत्र, आरोग्य, सौभाग्य तथा स्वर्ग प्राप्त करता है। (अध्याय ११७)

अखण्डद्वादशीव्रत

**ब्रह्माजीने कहा—**अब मैं मोक्ष तथा शान्तिप्रद अखण्डद्वादशीव्रतका वर्णन करता हूँ। मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिमें गौके दूध-दही आदिको भोजनरूपमें स्वीकार करके व्रत करनेवाले उपासकको जगत्के स्वामी भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। चार मासपर्यन्त अर्थात् फाल्गुनमासतक वह व्रती पाँच प्रकारके धान्यसे पूर्ण पात्र ब्राह्मणको दान दे और भगवान् विष्णुकी इस प्रकार प्रार्थना करे—

सप्तजन्मनि हे विष्णो यन्मया हि व्रतं कृतम्।
भगवंस्त्वत्प्रसादेन तदखण्डमिहास्तु मे॥
यथाखण्डं जगत्सर्वं त्वमेव पुरुषोत्तम।
तथाखिलान्यखण्डानि व्रतानि मम सन्तु वै॥
(११८। ३-४)

हे विष्णो! सात जन्मोंमें मैंने जो व्रत किये हैं, हे भगवन्! वे आपकी कृपासे इस जन्ममें पूर्ण हों। हे पुरुषोत्तम! जिस प्रकार आप ही इस सम्पूर्ण अखण्ड ब्रह्माण्डके रूपमें अवस्थित हैं, उसी प्रकार मेरे द्वारा किये गये ये सभी व्रत भी अखण्ड हो जायँ।

चैत्रादि (चार) मासमें सत्तूसे पूर्ण पात्र और श्रावण आदि चार महीनोंमें घृतपूर्ण पात्र ब्राह्मणको दान देना चाहिये।

इस विधिसे वर्षपर्यन्त द्वादशीव्रतका संकल्प लेकर जो व्रती अपने व्रतको पूर्ण करता है, वह स्त्री-पुत्रादिसे सम्पन्न होकर अन्तमें स्वर्गलोकका सुखोपभोग करता है। (अध्याय ११८)


अगस्त्यार्घ्यव्रत-निरूपण

**ब्रह्माजीने पुनः कहा—**हे मुने! भुक्ति-मुक्ति प्रदान करनेवाले अगस्त्यार्घ्यव्रतको कहता हूँ। कन्याराशिपर सूर्यकी संक्रान्तिके तीन दिन पहलेसे काशपुष्पकी बनी हुई अगस्त्यकी मूर्तिका प्रदोषकालमें पूजन करके कुम्भमें अर्घ्य देना चाहिये। (रात्रि) जागरण और उपवास करके दधि-अक्षत और फल-पुष्पसे पूजा करके पाँच वर्णसे युक्त सोने-चाँदीसे समन्वित सप्तधान्यसे भरे पात्रको दही और चन्दनसे रंजित कर ‘अगस्त्यः खननमानः०’* इस मन्त्रसे अगस्त्यको अर्घ्य प्रदान करे।

इसके बाद इस मन्त्रसे उन्हें नमस्कार करना चाहिये—

काशपुष्पप्रतीकाश अग्निमारुतसम्भव।
मित्रावरुणयोः पुत्र कुम्भयोने नमोऽस्तु ते॥
(११९। ५)

अर्थात् काशपुष्पके समान उज्ज्वल, अग्नि और वायुसे उत्पन्न मित्रावरुणके पुत्र हे कुम्भयोनि अगस्त्यजी! आपको नमस्कार है।

शूद्र, स्त्री आदि इसी विधिसे अगस्त्यके लिये


* ऋग्वेद (१। १७९। ६)।