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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 227 of 634

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Page 227

काण्ड ] अनंगत्रयोदशीव्रत २१७

अष्टमी तिथिमें दुर्गा और नवमी तिथिमें मातृका तथा दिशाएँ पूजित होनेपर अर्थ प्रदान करती हैं। दशमी तिथिमें यमराज और चन्द्र तथा एकादशी तिथिमें ऋषिगणोंकी पूजा करनी चाहिये। द्वादशीको हरि और कामदेव तथा त्रयोदशीको भगवान् शिव पूज्य हैं। चतुर्दशी और पूर्णिमा तिथियोंमें ब्रह्मा तथा अमावास्यामें पितृगणोंकी पूजा करनेसे वे धन-सम्पत्ति प्रदान करते हैं।

रवि, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि—ये सातों वार, अश्विनी आदि सत्ताईस नक्षत्र तथा योगोंकी पूजा करनेसे ये सब कुछ प्रदान करते हैं। (अध्याय ११६)

अनंगत्रयोदशीव्रत

ब्रह्माजीने कहा—हे व्यास! मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षकी त्रयोदशी तिथिमें अनंगत्रयोदशीव्रत होता है। इस तिथिमें मल्लिका-वृक्षकी दतुअन निवेदितकर धत्तूरके पुष्प एवं फलोंसे शिवकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर 'अनङ्गायैति०' इस मन्त्रसे भगवान् शिवको मधुका नैवेद्य अर्पित करना चाहिये। पौषमासमें भगवान् योगेश्वरका बिल्वपत्र, कदम्बके दतुअन, चन्दन तथा कृसर आदि नैवेद्यसे पूजन करना चाहिये।

हे मुने! माघमासमें भगवान् नटनागर शिवकी कुन्द-पुष्प तथा मौक्तिक मालासे पूजा करके उन्हें पाकड़वृक्षकी दतुअन और पूरिका (पूड़ी)-का नैवेद्य निवेदित करना चाहिये। फाल्गुनमासमें मरुबक (मंडक) नामक पुष्पोंसे भगवान् वीरेश्वरकी पूजा करनी चाहिये तथा उन्हें शर्करा, शाक, माँड़ और आम्र-वृक्षकी दतुअन निवेदित करे।

चैत्रमासमें भगवान् सुरूपकी पूजा करनी चाहिये और रात्रिमें उन्हें कर्पूरका प्राशन देना चाहिये। दन्तधावनके लिये वटवृक्षकी दतुअन तथा नैवेद्यके निमित्त शष्कुली (पूड़ी) प्रदान करे। वैशाखमासमें अशोकवृक्षके पुष्पोंसे भगवान् शिवका दमनक (संहारकारक) स्वरूप पूजनीय होता है। इन महास्वरूपधारी देवको नैवेद्यमें गुड़ और भात, दन्तधावनके लिये गूलर-वृक्षकी दतुअन और प्राशनके लिये जातिफल अर्पित करना चाहिये।

ज्येष्ठमासमें भगवान् प्रद्युम्नका पूजन चम्पक-पुष्पसे करे और बिल्व-वृक्षकी दतुअन एवं लवङ्गांश (लौंग फलके टुकड़े)-के नैवेद्य समर्पित करना चाहिये। आषाढ़मासमें उमाभद्रकी पूजा करनी चाहिये। इसमें अगुरुकी गन्ध, अपामार्गकी दतुअन उन्हें प्रदान की जाती है।

श्रावणमासमें भगवान् शूलपाणि शिवकी पूजा होती है। उन्हें करवीर-पुष्प, गन्ध, घृतादिसे युक्त भोजन तथा करवीर-वृक्षकी दतुअन निवेदित की जाती है। भाद्रपदमासमें सद्योजात शिवका पूजन बकुल-पुष्प और अपूप (पूए)-के नैवेद्यसे करना चाहिये। आश्विनमासमें चम्पक-पुष्प, स्वर्णकलशके जल और सुवासित मोदकके नैवेद्यसे तथा दमनककी दतुअनसे सुराधिप शिवके पूजनका विधान है। कार्तिकमासमें खदिर (कत्थे)-की दतुअनसे तथा बेरकी दतुअन, मदन-पुष्प, दूध और शाक प्रदान करते हुए वर्षपर्यन्त कमल-पुष्पसे शिवकी पूजा करनी चाहिये।

उपर्युक्त विधिसे पूजन करनेके पश्चात् रतिसहित अनंग—कामदेवको स्वर्णसे निर्मित मण्डलके अन्तर्गत स्थापित करके उनकी गन्धादिसे पुनः पूजा कर तिल और चावल आदिसे संयुक्त हवन-सामग्रीसे उन्हें दस हजार आहुतियाँ प्रदान करनेका विधान है।