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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 218 of 634

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Page 218
२०८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

मार्ग-गमन और मैथुन तथा ज्वर—ये सद्यः पुरुषका बल हर लेते हैं।

जो मलिन वस्त्र धारण करता है, दाँतोंको स्वच्छ नहीं रखता, अधिक भोजन करनेवाला है, कठोर वचन बोलता है, सूर्योदय तथा सूर्यास्तके समय भी सोता है; वह यदि साक्षात् चक्रपाणि विष्णु हो तो उसे भी लक्ष्मी छोड़ देती हैं।<sup>१</sup>

जो मनुष्य नखसे तृणका छेदन करता है, पृथिवीपर लिखता है, चरणोंका प्रक्षालन नहीं करता, दाँत स्वच्छ नहीं रखता, मलिन वस्त्र धारण करता है, केश संस्कारविहीन रखता है, प्रातः एवं सायंकालकी संध्याओंमें सोता है, नग्न शयन करता है, भोजन और परिहास अधिक करता है, अपने अङ्ग और आसनपर बाजा बजाता है तो भगवान् विष्णुके समान होनेपर भी उसे लक्ष्मी त्याग देती हैं। जो पुरुष अपने सिरको जलसे धोकर स्वच्छ रखता है, चरणोंको प्रक्षालित करके मलरहित करता है, वेश्यागमनसे दूर रहता है, अल्पभोजन करता है, नग्न शयन नहीं करता तथा पर्वरहित दिवसोंमें स्त्री-सहवास करता है तो उसके ये षट्कर्म चिरकालसे विनष्ट हुई उसकी लक्ष्मीको पुनः उसके सांनिध्यमें ले आते हैं।

बालसूर्यके तेज, जलती हुई चिताका धुआँ, वृद्ध स्त्री, बासी दही और झाड़ूकी धूलिका सेवन दीर्घ आयुकी कामना करनेवाले पुरुषको नहीं करना चाहिये।

हाथी, अश्व, रथ, धान्य तथा गौकी धूलि शुभ होती है। किंतु गधा, ऊँट, बकरी एवं भेड़की धूलिको अशुभ मानना चाहिये। गौकी धूलि, धान्यकी धूलि और पुत्रके अङ्गमें लगी हुई जो धूलि है, वह महान् कल्याणकारी एवं महापातकोंका विनाशक है।<sup>२</sup>

सूप फटकनेसे निकली हुई वायु, नखाग्र (नाखून)-का जल, स्नान किये हुए वस्त्रसे निचोड़ा हुआ जल, केशसे गिरता हुआ जल तथा झाडूकी धूलि मनुष्यके पूर्वजन्मके अर्जित पुण्यको भी नष्ट कर देती है। ब्राह्मण तथा अग्निके बीचसे, दो ब्राह्मणके बीचसे, पति-पत्नीके बीचसे, स्वामि-स्वामिनीके बीचसे तथा घोड़ा और साँड़के बीचसे नहीं जाना चाहिये।

स्त्री, राजा, अग्नि, सर्प, स्वाध्याय, शत्रुंकी सेवा, भोग और आस्वादमें कौन ऐसा बुद्धिमान् होगा जो विश्वास करेगा?<sup>३</sup> अविश्वसनीयपर विश्वास तथा विश्वस्त प्राणीपर अधिक विश्वास नहीं करना चाहिये, क्योंकि विश्वास करनेसे जो भय उत्पन्न होता है, वह मनुष्यको समूल नष्ट कर देता है। जो मनुष्य शत्रुके साथ संधि करके आश्वस्त रहता है, वह निश्चित ही वृक्षकी शाखाके अग्रभागपर सोये हुए मनुष्यके समान गिरनेके पश्चात् ही जागता है।<sup>४</sup>

प्राणीको अत्यन्त सरल अथवा अत्यन्त कठोर नहीं होना चाहिये, क्योंकि सरल स्वभावसे सरल और कठोर स्वभावसे कठोर शत्रुको नष्ट किया जा सकता है। अत्यन्त सरल तथा अत्यन्त कोमल नहीं होना चाहिये। सरल अर्थात् सीधे वृक्ष ही काटे जाते हैं, टेढ़े तो यथास्थितिमें खड़े रहते हैं। फलसे परिपूर्ण वृक्ष एवं गुणवान् व्यक्ति विनम्र


१-कुचैलिनं दन्तमलोपधारिणं बह्वाशिनं निष्ठुरवाक्यभाषिणम्।
सूर्योदये ह्यस्तमयेऽपि शायिनं विमुञ्चति श्रीरपि चक्रपाणिम्॥ (११४।३५)
२-गवां रजो धान्यरजः पुत्रस्याङ्गोद्भवं रजः। एतद्रजो महाशस्तं महापातकनाशनम्॥ (११४।४२)
३-स्त्रीषु राजाग्निसर्पेषु स्वाध्याये शत्रुसेवने। भोगास्वादेषु विश्वासं कः प्राज्ञः कर्तुमर्हति॥ (११४।४६)
४-न विश्वसेदविश्वस्तं विश्वस्तं नातिविश्वसेत्। विश्वासाद्भयमुत्पन्नं मूलादपि निकृन्तति॥
वैरिणा सह संधाय विश्वस्तो यदि तिष्ठति। स वृक्षाग्रे प्रसुप्तो हि पतितः प्रतिबुध्यते॥ (११४।४७-४८)