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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 217 of 634

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Page 217

काण्ड ] नीतिसार २०७


चाहिये, क्योंकि इन्द्रियोंका समूह बलवान् होता है, वह विद्वान्‌को भी [दुराचरणकी ओर] खींच लेता है—

मात्रा स्वस्त्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो वसेत्।
बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति॥ (११४।६)

हे शौनक ! उपयुक्त अवसर न होनेसे, एकान्त स्थान न होनेसे तथा प्रार्थयिता व्यक्तिके सुलभ न होनेसे ही स्त्रियोंमें सतीत्व पाया जाता है।

जो मधुर पदार्थोंसे बालकको, विनम्रभावसे सज्जन पुरुषको, धनसे स्त्रीको, तपस्यासे देवताको और सद्‌व्यवहारसे समस्त लोकको अपने वशमें कर लेता है, वही पण्डित है। जो लोग कपटसे मित्र बनाना चाहते हैं, पापसे धर्म कमाना चाहते हैं, दूसरेको संतप्त करके धन-संग्रह करना चाहते हैं, बिना परिश्रमके ही सुखपूर्वक विद्या-अर्जन करना चाहते हैं और कठोर व्यवहारके द्वारा स्त्रियोंको वशमें रखनेकी अभिलाषा रखते हैं, वे पण्डित (कुशल) नहीं हैं।

फलकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य यदि फल-समन्वित वृक्षका ही मूलोच्छेद कर डालता है तो वह दुर्बुद्धि है। उसे फल कभी नहीं प्राप्त हो सकता। अविश्वसनीय व्यक्तिका कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। मित्रका भी [अधिक] विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि कदाचित् क्रुद्ध होनेपर मित्र भी समस्त गोपनीयताको प्रकट कर सकता है—

न विश्वसेदविश्वस्ते मित्रस्यापि न विश्वसेत्।
कदाचित् कुपितं मित्रं सर्वं गुह्यं प्रकाशयेत्॥ (११४।२२)

सभी प्राणियोंमें विश्वास करना, सभी प्राणियोंके प्रति सात्त्विक भाव रखना एवं अपने सत्-स्वभावकी रक्षा करना—ये सज्जन पुरुषके लक्षण हैं।

दरिद्रके लिये गोष्ठी* विषके समान है और वृद्ध व्यक्तिके लिये युवती विषके समान है। भलीभाँति आत्मसात् न की गयी विद्या विष है तथा अजीर्ण-दशामें किया गया भोजन विषके समान (अनिष्टकारी) है। अकुण्ठित व्यक्तिको गायन, नीच व्यक्तिको उच्च आसनकी प्राप्ति, दरिद्रको दान तथा युवकको तरुणी प्रिय होती है।

अधिक मात्रामें जलका पीना, गरिष्ठ भोजन, धातुकी क्षीणता, मल-मूत्रका वेग रोकना, दिनमें सोना एवं रात्रिमें जागरण करना—इन छः कारणोंसे मनुष्योंके शरीरमें रोग निवास करने लगते हैं—

अत्यम्बुपानं कठिनाशनं च
धातुक्षयो वेगविधारणं च।
दिवाशयो जागरणं च रात्रौ
षड्भिर्नराणां निवसन्ति रोगाः॥ (११४।२८)

प्रातःकालीन धूप, अतिशय मैथुन, श्मशान-धूमका सेवन, अग्निमें हाथ सेंकना और रजस्वला स्त्रीका मुख-दर्शन—ये दीर्घ आयुका विनाश करनेवाले हैं। शुष्क मांस, वृद्धा स्त्री, बालसूर्य, रात्रिमें दहीका प्रयोग, प्रभातकालमें मैथुन एवं [प्रभातकालीन] निद्रा—ये छः सद्यः प्राणविनाशक होते हैं।

तत्काल पकाया गया घृत (ताजा घी), द्राक्षाफल, बाला स्त्री, दुग्ध-सेवन, गरम जल तथा वृक्षोंकी छाया—ये शीघ्र ही प्राण (शक्ति) प्रदान करनेवाले हैं। कुएँका जल और वटवृक्षकी छाया शीतकालमें गरम तथा गर्मीमें शीतल होते हैं। तैलमर्दन और सुन्दर भोजनकी प्राप्ति—ये सद्यः शरीरमें शक्तिका संचार करते हैं, किंतु


* मित्रोंको आमन्त्रित कर उनके साथ भोजन-जलपानादिकी व्यवस्था वहन कर मनोरंजन करना आदि।

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