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अशौच तथा आपद्वृत्ति-निरूपण
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बालकका मरण हुआ और उसका अग्नि-संस्कार किया गया तो एक दिनमें शुद्धि हो जाती है। गुरु<sup>१</sup> और अन्तेवासी (शिष्य) वेदाङ्गोंका प्रवक्ता, मामा<sup>२</sup>, श्रोत्रिय<sup>३</sup> एवं अनौरस<sup>४</sup> पुत्र, अपनी वह भार्या जो प्रतिलोम संकरसे अतिरिक्त किसी अन्यके आश्रयमें रह रही है, उसके तथा अपने देशके राजाकी मृत्युपर एक दिनका अशौच होता है। राजा (अभिषिक्त क्षत्रिय आदि राजा), गौ (पशुमात्र), ब्राह्मण (मनुष्यमात्र)-के द्वारा जो आहत होता है, उसके सम्बन्धियोंकी स्नानमात्रसे तत्काल शुद्धि हो जाती है। ऐसे ही जिसने विष या बन्धन आदिके द्वारा बुद्धिपूर्वक आत्मघात कर लिया है, उसके सम्बन्धियोंकी भी तत्काल स्नानमात्रसे शुद्धि हो जाती है और समस्त पृथ्वी या पृथ्वीके एक देशके अभिषिक्त अधिपति क्षत्रिय आदिको मरण या उत्पत्तिनिमित्तिक अशौच नहीं होता। सत्री (लगातार अन्नसत्र चलानेवाले), व्रती (कृच्छ्र, चान्द्रायण आदि व्रतमें प्रवृत्त), ब्रह्मचर्यव्रतमें प्रवृत्त, दाता (वह वानप्रस्थाश्रमी जो केवल दान ही देता है, प्रतिग्रह कभी भी नहीं करता), ब्रह्मविद् (संन्यासी) किसी भी प्रकारके अशौचसे ग्रस्त नहीं होते। दान (किसीको देनेके लिये पूर्वमें संकल्पित द्रव्य), विवाह (विवाहके निमित्त एकत्रित सामग्री), यज्ञ आदि विशेष कृत्योंके लिये एकत्रित सामग्री, संग्राम (युद्धकाल)-में, देशमें अतिभयंकर या राजभयसे उत्पन्न विप्लवकी दशामें, अतिकष्टकर आपत्तिमें किसी भी प्रकारके अशौचकी निवृत्ति तत्काल ही हो जाती है अर्थात् अशौच नहीं होता।
जो अकार्यकारी अर्थात् निषिद्ध कार्य करनेवाले हैं, उनकी शुद्धि दान देनेसे होती है। ग्रीष्म-ऋतु आदिके प्रभावसे जो नदी अत्यल्प जलवाली हो जाती है और उसके किनारे आदि अपवित्र वस्तुओंसे उपहत हो जाते हैं वह नदी जलके वेगपूर्ण उस प्रवाहसे शुद्ध हो जाती है जो प्रवाह नदीको जलमय बना दे और उसके किनारोंको काट देनेमें समर्थ हो।
आपत्कालमें ब्राह्मणको क्षत्रिय एवं वैश्यवर्णकी वृत्तिसे जीविकाका निर्वाह करना चाहिये, किंतु वैश्यवृत्ति करनेवाले ब्राह्मणके लिये फल, सोमलता, क्षौमवस्त्र (सभी वस्त्र), वेत्र आदिकी लताएँ, औषधि लता, दधि, दुग्ध, घृत, जल, तिल, ओदन, रस, क्षार, मधु, लाक्षा, पकाया हुआ हविष्यान्न, वस्त्र, मणि आदि प्रस्तरमात्र, आसव, पुष्प, शाक, मिट्टी, चर्म, पादुका, मृगचर्म, कौशेय (वस्त्र), लवण, मांस, तिलकुट (पिण्याक), मूल और सुगन्धित द्रव्य-पदार्थोंका विक्रय वर्जित है।
ब्राह्मणके द्वारा अपने श्रौत-स्मार्त-यज्ञकी पूर्णताके लिये अपेक्षित धान्य या अन्य किसी अत्यावश्यक औषधि आदिकी व्यवस्थाके लिये अपेक्षित धान्यके बराबर तिलका विक्रय करके धान्यका संग्रह किया जा सकता है। किंतु आपत्कालमें भी लवणादिका व्यापार ब्राह्मणके लिये अवश्य वर्जित है। (आपत्तियोंके कारण नमकादिके अतिरिक्त) ब्राह्मण अन्य जो कुछ हीन आवैश्यवृत्ति करता है, उसमें वह उसी प्रकार निष्कलुष रहता है जैसे सूर्य। आपत्कालमें ब्राह्मण कृषि एवं पशुपालनादि कार्य कर सकता है, किंतु उसके द्वारा अश्वोंका विक्रय त्याज्य है।
१-पिता ही यदि गुरु होते हैं तो उनकी मृत्युपर पिताकी मृत्युपर होनेवाला अशौच होगा।
२-यहाँ मामा मात्रको नहीं लेना है, अपितु मातृ-पक्ष एवं पितृ-पक्षके जितने भी बन्धु हैं उन सबको लेना है।
३-वेदकी एक शाखामात्रका अध्येता।
४-औरसके अतिरिक्त क्षेत्रज, दत्तक आदि पुत्र।