गरुड़ पुराण
Garuda Purana
by महर्षि वेदव्यास
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वैश्यवृत्ति या शूद्रवृत्ति भी ब्राह्मण स्वीकार कर सकता है। यही क्षत्रिय एवं वैश्यके बारेमें भी व्यवस्था है। जब कोई वर्ण अपनी मुख्यवृत्तिका परित्याग कर अन्य द्वितीय, तृतीय वर्णकी वृत्ति स्वीकार करता है तो यह हीनवर्णकी वृत्ति मानी जाती है और यह हीनवर्णकी वृत्ति स्वीकार करना ही ‘कर्म-व्यत्यय' है। इस प्रकारके कर्म-व्यत्यय होनेपर आपत्तिकालके अभावमें भी यदि कोई हीनवर्णकी वृत्तिका परित्याग नहीं करता है तो उसकी सातवीं, छठी, पाँचवीं कुल-परम्परामें उत्पन्न संतति उस हीनवर्णकी ही होगी जिस हीनवर्णकी वृत्ति स्वीकार कर जीविका निर्वाह किया जा रहा है। दृष्टान्तके रूपमें यह कहा जा सकता है—यदि कोई ब्राह्मण शूद्रवृत्तिसे जीविका चला रहा है और उसका परित्याग बिना किये पुत्र उत्पन्न कर रहा है तथा यह पुत्र भी शूद्रवृत्तिसे अपना जीवन चलाता हुआ अपना पुत्र उत्पन्न कर रहा है एवं यह तीसरा पुत्र भी शूद्र-वृत्तिमें रहकर ही अपना पुत्र उत्पन्न कर रहा है तो ऐसी परम्परामें सातवें जन्ममें शूद्र ही उत्पन्न होगा। वैश्यवृत्तिसे जीविका निर्वाहकी दशामें छठे जन्ममें वैश्य ही उत्पन्न होगा। क्षत्रियवृत्तिसे जीविका निर्वाहकी स्थितिमें पाँचवें जन्ममें क्षत्रिय ही उत्पन्न होगा। क्षत्रिय भी शूद्रवृत्तिसे जीविका निर्वाह करनेपर छठे वंशमें शूद्रवर्णकी एवं वैश्यवृत्तिसे जीविका निर्वाह करनेपर पाँचवें वंशमें वैश्यवर्णकी संतान उत्पन्न करेगा। ऐसे ही वैश्य भी शूद्रवृत्तिसे जीविका निर्वाह करते हुए अपनी पुत्र-परम्पराके पाँचवें जन्ममें शूद्रको ही उत्पन्न करेगा।
इसी प्रसंगसे यह भी ज्ञातव्य है—तीन प्रकारकी जातियाँ हैं—१-संकर जाति, २-संकीर्ण संकर जाति तथा ३-वर्ण संकीर्ण संकर जाति। संकर जातिके मूर्धावसिक्त अम्बष्ठ आदि छः भेद ऊपर बताये गये हैं। इन्हें अनुलोमज कहा जाता है। ऐसे ही सूत, वैदेहक आदि भी छः संकर जातिके भेद पहले ही कहे जा चुके हैं। ये प्रतिलोमज हैं। संकीर्ण संकर जातिके जो लोग होते हैं, उनका निर्देश पहले रथकारकी उत्पत्ति बताकर किया गया है। अब वर्ण संकीर्ण संकर जातिके लोगोंको इस प्रकार समझनी चाहिये—मूर्धावसिक्ता स्त्रीमें क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्रसे जो उत्पादित हैं, ऐसे ही अम्बष्ठ जातिकी स्त्रीमें वैश्य अथवा शूद्रके द्वारा जो उत्पादित हैं और पारशव निषाद जातिकी स्त्रीमें शूद्रके द्वारा जो उत्पादित हैं, वे वर्ण संकीर्ण संकर जातिके होते हैं। इन्हें, अधर प्रतिलोमज कहते हैं। इसी प्रकार मूर्धावसिक्त, अम्बष्ठ एवं पारशव निषाद जातिकी स्त्रियोंमें ब्राह्मणके द्वारा जो उत्पादित हैं, माहिष्य एवं उग्रजातिकी स्त्रियोंमें ब्राह्मण अथवा क्षत्रियसे जो उत्पादित हैं और करणजातिकी स्त्रीमें ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्यसे जो उत्पादित हैं, उन्हें उत्तर अनुलोमज कहते हैं। उनमें अधर प्रतिलोमज असत् तथा उत्तर प्रतिलोमज सत् माने जाते हैं।
गृहस्थाश्रमीको प्रतिदिन विवाहाग्निमें अथवा सम्पत्ति विभागके समय स्वयं लायी गयी संस्कृत-अग्निमें स्मार्तकर्म वैश्वदेव आदि सम्पन्न करना चाहिये। श्रौतकर्मानुष्ठान अग्निहोत्र आदि वैतानाग्नि (आहवनीय आदि अग्नियों)-में करना चाहिये। शरीर चिंता (प्रातः-सायं अवश्य करणीय मल-मूत्र विसर्जन)-को शास्त्रीय विधिसे सम्पन्न कर, गन्ध-लेपनिवृत्तिपर्यन्त शुद्धि प्राप्तकर दन्तधावन एवं स्नानकर द्विजको प्रातःकाल संध्योपासन करना चाहिये तथा अनन्तर अग्निमें हवन (अग्निहोत्र) करके समाहितचित्तसे सूर्यदेवताके मन्त्रोंका* जप
* 'उदु त्यं जातवेदसं०' आदि।