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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

Page 173 of 634

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Page 173

काण्ड ] वर्णसंकर जातियोंका प्रादुर्भाव, गृहस्थधर्म, वर्णधर्म तथा सैंतीस प्रकारके अनध्याय १६३


वर्णसंकर जातियोंका प्रादुर्भाव, गृहस्थधर्म, वर्णधर्म तथा सैंतीस प्रकारके अनध्याय

**याज्ञवल्क्यजीने कहा—**अब मैं संकर जातियोंकी उत्पत्ति एवं गृहस्थादिके श्रेष्ठ धर्मोंका वर्णन करता हूँ।

ब्राह्मण पुरुषसे विवाहिता क्षत्रिय कन्यामें मूर्धावसिक्त, विवाहिता वैश्य कन्यामें अम्बष्ठ और विवाहिता शूद्रामें पारशव निषाद नामक संकरका जन्म होता है¹। क्षत्रिय पुरुषसे वैश्य कन्यामें माहिष्य तथा शूद्रामें म्लेच्छकी उत्पत्ति होती है। वैश्य पुरुषसे शूद्रवर्णा स्त्रीमें करण नामक संकर जातिकी संतानका जन्म होता है³। क्षत्रिय पुरुषसे ब्राह्मण स्त्रीमें सूत, वैश्य पुरुषसे ब्राह्मणीमें वैदेहक तथा शूद्र पुरुषसे ब्राह्मणीमें सर्ववर्णनिन्दनीय चाण्डालकी उत्पत्ति होती है। क्षत्रिय स्त्रीमें वैश्यसे मागध और शूद्रसे क्षत्ता नामक संकर संतानका जन्म होता है। इसी प्रकार वैश्य स्त्री शूद्र पुरुषके संसर्गसे आयोगव⁴ नामक वर्णसंकर पुत्रको जन्म देती है। क्षत्रिय पुरुषसे वैश्य कन्यामें उत्पन्न हुए माहिष्य संकरके द्वारा करणी (वैश्यसे शूद्रामें उत्पन्न) स्त्रीके साथ संसर्ग होनेपर रथकारका जन्म होता है।

जो उच्चवर्णीय पुरुषसे निम्नवर्णा स्त्रीमें संतान उत्पन्न होती है, वह अप्रतिलोमज अथवा अनुलोमज संतान है और जो निम्नवर्गीय पुरुषसे उच्चवर्णा स्त्रीमें संतान जन्म ग्रहण करती है, वह प्रतिलोमज संतान है। प्रतिलोमज असत् हैं और अनुलोमज सत् हैं।

जातिका उत्कर्ष सातवें, पाँचवें अथवा छठे जन्ममें होता है। यहाँ जाति शब्दसे अभी वर्णित मूर्धावसिक्त आदि जातियाँ ली गयी हैं। प्रकृतमें संक्षेपसे यह समझना चाहिये—ब्राह्मणसे शूद्रामें उत्पन्न संतान निषाद कही जाती है। यह संतान यदि कन्या है तो इसे निषादी कहा जाता है। इसका यदि ब्राह्मणसे विवाह हो और उससे उत्पन्न कन्याका पुनः ब्राह्मणसे विवाह हो, आगे उससे भी उत्पन्न कन्याका पुनः ब्राह्मणसे ही विवाह हो—इसी क्रमसे उत्पन्न छठी कन्यासे विवाहित ब्राह्मणके द्वारा उत्पादित सातवीं संतान शुद्ध ब्राह्मणवर्णकी होगी। ऐसे ही ब्राह्मणसे वैश्य जातीय कन्यामें उत्पन्न अम्बष्ठ जातिकी पाँचवीं कन्याकी छठी संतान शुद्ध ब्राह्मण होगी। मूर्धावसिक्ता कन्याकी भी इसी क्रमसे उत्पन्न चौथी कन्याकी पाँचवीं संतान शुद्ध ब्राह्मण ही होगी। ठीक यही स्थिति उग्रा और माहिष्याकी है। ये दोनों उग्र एवं माहिष्य जातिकी कन्याएँ यदि क्षत्रियसे ही विवाहित होती गयीं तो इनकी छठी और पाँचवीं संतति शुद्ध क्षत्रिय ही होगी। ऐसे ही करण जातिकी कन्या वैश्यवर्णके पुरुषसे विवाहित होकर यथाक्रम पाँचवें संतानको शुद्ध वैश्यरूपमें ही उत्पन्न करेगी।

इसके अतिरिक्त यह भी जानने योग्य है कि कर्मका व्यत्यय होनेसे भी जिस वर्णका कर्म किया जा रहा है, वही वर्ण सातवें, छठे तथा पाँचवें जन्मकी संतानका हो जाता है। स्पष्टरूपमें इस प्रकार समझा जा सकता है—धर्मशास्त्रके अनुसार ब्राह्मणको अपनी मुख्यवृत्ति याजन तथा अध्यापन आदिसे जीविका चलानी चाहिये। आपत्कालमें अपनी मुख्यवृत्तिसे जीविका न चल पानेपर क्षत्रियवृत्ति,


१-ये अनुलोम संकर कहे जाते हैं।
२-याज्ञवल्क्यस्मृति (४।९२)-के अनुसार क्षत्रियसे शूद्रामें उग्र नामकी संकर जातिकी संतान उत्पन्न होती है।
३-मूर्धावसिक्त, अम्बष्ठ, निषाद, माहिष्य, उग्र एवं करण—ये छः अनुलोमज पुत्र हैं।
४-सूत, वैदेहक, चाण्डाल, मागध, क्षत्ता एवं आयोगव—ये छः प्रतिलोमज पुत्र हैं।