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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

by महर्षि व्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished656 pages

Page 561 of 656

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Page 561

क्री०ख०-अ० १२०] * दूतोंका धर्म एवं अधर्मकी मृत्युका समाचार दैत्यराज सिन्धुको देना * ५५९
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एक सौ बीसवाँ अध्याय
दूतोंका धर्म एवं अधर्मकी मृत्युका समाचार दैत्यराज सिन्धुको देना, सिन्धुद्वारा शोक प्रकट
करना, सखियोंद्वारा समाचार मिलनेपर सिन्धुपत्नी दुर्गाका राजसभामें उपस्थित हो
पुत्रोंके लिये विलाप करना, सखियोंद्वारा उसे आश्वस्त करना, क्रुद्ध दैत्यराज
सिन्धुका चतुरंगिणी सेना लेकर युद्धके लिये प्रस्थान, उसी समय
पिता चक्रपाणिका प्रकट होकर पुत्र सिन्धुको मैत्रीका उपदेश
देना, किंतु सिन्धुका उसे अस्वीकृत कर देना
ब्रह्माजी बोले—मरनेसे बचे हुए कुछ वीर
मुझे मृत्युलोकमें छोड़कर मेरे वे दोनों पुत्र स्वर्गलोक
सैनिक; जिनके शरीरसे रक्त प्रवाहित हो रहा था और
क्यों चले गये ? वे दोनों वीर देवसेनाको मार डालनेवाले
जो अत्यन्त दुखित थे, दैत्यराज सिन्धुके पास आये और
तथा यमराजका भी अन्त करनेवाले थे॥ ९ ॥
सभामें विराजमान सिन्धुसे अत्यन्त भयभीत होते हुए इस
[हे पुत्रो!] 'यदि मैं शत्रुके सिरको काटकर यहाँ
प्रकार कहने लगे— ॥ १ ॥
नहीं लाऊँगा तो मैं आपको अपना मुख नहीं दिखलाऊँगा'—
वीर बोले—हे धनुर्धर ! आप इस अत्यन्त दुःख
ऐसा तुमने युद्धके लिये प्रस्थान करते समय मुझसे कहा
प्रदान करनेवाले वचनको सुनिये। आपके दोनों पुत्रों धर्म
था, क्या तुमने उस वचनको सत्य कर दिया है ॥ १० ॥
और अधर्मने महान् युद्ध करके देवसेनाको मार-मारकर
तदनन्तर अत्यन्त दुःखके कारण रोती हुई सखियोंने
यमलोकमें पहुँचा दिया। तदनन्तर देवसेनामेंसे कोई महान्
अन्तःपुरमें स्थित धर्म और अधर्मकी माता दुर्गासे सब
वीर युद्ध करने आया, जिसके छह मुख थे॥ २-३॥
समाचार विस्तारसे बतलाया ॥ ११ ॥
उसे भी भीषण युद्धमें आपके पुत्रोंद्वारा जमीनपर
सखियोंने कहा—हे सुन्दर भौंहोंवाली ! धर्म और
पटक दिया गया, किंतु उसने उठकर उन दोनों वीरोंकी
अधर्म नामक पुत्रोंके मारे जानेसे आपके स्वामी दैत्यराज
शिखाके बालोंको पकड़ लिया और बहुत बार घुमाते
सिन्धु अत्यन्त रुदन कर रहे हैं। यह सुनकर शय्यापर
हुए जमीनपर गिरा दिया, जिस कारण उनकी देहके
स्थित वह दुर्गा उसी प्रकार भूमिपर गिर पड़ी, जैसे कि
सैकड़ों टुकड़े हो गये और वे दोनों उत्तम स्वर्गलोकको
अत्यन्त कोमल और अरुणवर्णके पल्लवयुक्त केलेके
चले गये ॥ ४-५ ॥
वृक्ष आँधीके द्वारा गिरा दिये जाते हैं ॥ १२ ॥
ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार उनकी बात सुनकर
सखियोंके अमांगलिक वचनोंसे उसका हृदय इस
दैत्यश्रेष्ठ वह सिन्धु शोकसागरमें निमग्न हो गया और
प्रकार विद्ध हो गया, मानो बाणोंसे बिंध गया हो। उसके
उसी प्रकार भूमिपर गिर पड़ा, जैसे कि वज्रके प्रहारसे
केश तथा आभूषण अस्त-व्यस्त हो गये। उस समय वह
पर्वत गिर पड़ता है। उसी समय बन्धु-बान्धवों तथा
भी बहुत रोने लगी ॥ १३ ॥
मित्रोंने दौड़ते हुए उसे शीघ्र ही बलपूर्वक उठा लिया,
उसके वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गये थे, जिसके
मुहूर्तभरके अनन्तर उसकी चेतना लौट आयी, तब वह
कारण बिल्वफलके सदृश शोभास्पद उसका वक्षःस्थल
बहुत दुखित होता हुआ शोक करने लगा॥ ६-७॥
अनावृत-सा हो गया था। आँसुओंके गिरनेसे उसके
सिन्धु बोला—जिन्होंने पूर्वकालमें युद्धमें इन्द्र
कपोल श्यामल वर्णके प्रतीत हो रहे थे। शोकरूपी
आदि लोकपालोंको भी जीत लिया था, उन महाबली
अग्निसे उसकी प्रभा मलिन-सी हो गयी थी ॥ १४ ॥
धर्म और अधर्म नामक दोनों वीरोंको छः मुखवाले
वह अपने दोनों हाथोंसे मुखपर प्रहार कर रही
कार्तिकेयने कैसे मार दिया ? ॥ ८ ॥
थी, उसके दाँतोंसे निकलनेवाले रक्तसे भूमि सिक्त हो