श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 560, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५५८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
अलंकृत थे और वे दोनों अनेकों आयुधोंको धारण किये
हुए थे। वे दोनों महाबली अपने कानोंमें रत्न तथा सुवर्णसे
मण्डित कुण्डलोंको धारण किये हुए थे तथा अत्यन्त
तेजोमय मुकुटोंसे सुशोभित हो रहे थे। वे मोती तथा
मणियोंसे बनी मालाओंको धारण किये हुए थे। इस
प्रकारके वे दोनों युद्धोन्मत्त दैत्य विविध प्रकारके वाद्योंके
घोषके साथ रणभूमिमें पहुँचे ॥ १७-१९॥
वीरभद्र आदिने उन दोनों दैत्यवीरों तथा उनकी
सेनाको भी देखा। उन दोनोंको समीपमें आया देखकर
देव मयूरेशसे प्रेरणा प्राप्तकर वीरभद्र, कार्तिकेय, क्रोधित
हिरण्यगर्भ तथा विशाल नेत्रवाला भूतराज- ये चारों
असंख्य सेनाको साथ लेकर युद्धभूमिके लिये निकल
पड़े॥ २०-२१ १/२॥
तदनन्तर दोनों सेनाओंके सैनिकोंके बीच भीषण
युद्ध हुआ। दोनों पक्षोंके वे वीर एक-दूसरेके सिर, पैर,
बाहु, उदर एवं कन्धेपर वार कर रहे थे। धूलसे सूर्यके
आच्छादित हो जानेके कारण मरे हुए वीरोंको पुनः मारा
जा रहा था ॥ २२-२३ ॥
कुछ योद्धा चक्र छोड़ रहे थे तो कोई दूसरे
भिन्दिपाल चला रहे थे। कुछ दूसरे बाणोंकी वर्षा कर
रहे थे तो कुछ सैनिक विविध प्रकारके अस्त्रोंके द्वारा
युद्ध कर रहे थे। वहाँपर सैनिक वीरोंका आपसमें
मल्लयुद्ध होने लगा। इस प्रकार मयूरेशद्वारा रक्षित
सेनाका दैत्यसेनाद्वारा संहार हुआ ॥ २४-२५ ॥
वहाँ जो सैनिक बच गये थे, वे विह्वल होकर दसों
दिशाओंमें भाग गये। यह देखकर षडानन कार्तिकेय अत्यन्त
क्रुद्ध हुए, उस समय वे अपने बारह हाथोंमें धारण किये
गये बारह आयुधोंसे सुशोभित हो रहे थे ॥ २६ ॥
तदनन्तर उन्होंने दैत्यराज सिन्धुद्वारा रक्षित सेनाका
उन आयुधोंके द्वारा शीघ्र ही विनाश कर दिया। कुछ
वीरोंके बाहु कट गये थे। किन्हीं वीरोंके बीचसे दो टुकड़े
हो गये थे। उस युद्धमें किसीके मस्तक कट गये थे, तो
किसी सैनिकके पैर कट गये थे। इस प्रकार हाथी, घोड़े
एवं रथोंसे भरी हुई वह सेना नाशको प्राप्त हो चुकी
थी ॥ २७-२८ ॥
उनमेंसे कुछ वीरोंने स्वर्ग प्राप्त किया, कुछने
षडाननके स्वरूपको प्राप्त किया। मारे जाते हुए जिन
महान् बलशाली सैनिकोंने मयूरेशको देखते हुए अपने
प्राणोंको छोड़ा था, वे उनकी कृपासे उनके निजधामको
प्राप्त हुए। मयूरेशकी कृपादृष्टि पड़नेपर उनके सभी
जन्मोंमें किये गये पाप विनष्ट हो गये थे ॥ २९-३० ॥
कार्तिकेयके पुच्छयुक्त बाणोंके द्वारा अपनी समस्त
सेनाको विनष्ट हुआ देखकर दैत्यराज सिन्धुके अधर्म
एवं धर्म नामक दोनों वीर पुत्रोंने अस्त्रों, शस्त्रों तथा
बाणसमूहोंके द्वारा कार्तिकेयके साथ बहुत प्रकारसे युद्ध
किया। तदनन्तर कुछ ही क्षणोंमें उन दोनोंने कार्तिकेयके
साथ मल्लयुद्ध किया ॥ ३१-३२ ॥
उन दोनों दैत्योंका इस प्रकारका बल-पराक्रम
देखकर छः बाहुओंवाले उन महान् बलशाली कार्तिकेयने
अपने छहों हाथोंसे बलपूर्वक शीघ्र ही उन दैत्योंकी
चोटीको पकड़ लिया और अनेक बार घुमाते हुए भूमिपर
पटक दिया। भूमिपर गिरनेसे उन दोनोंके शरीरके सैकड़ों
टुकड़े हो गये ॥ ३३-३४ ॥
भगवान् शिवके पुत्रद्वारा विजय प्राप्त कर लेनेपर
चारों ओर वाद्य बजने लगे। सभी सैनिक 'हे मयूरेश!
तुम्हारी जय हो' इस प्रकारसे कहने लगे ॥ ३५ ॥
तदनन्तर कार्तिकेय, वीरभद्र, भूतराज तथा
हिरण्यगर्भ—ये चारों अपने स्वामी मयूरेशके पास गये।
उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक मयूरेशका आलिंगन किया और वे
आपसमें वार्तालाप करने लगे ॥ ३६ ॥
वे चारों पुनर्जन्म प्राप्त करनेके समान परस्पर
आनन्दित हो उठे। उन्होंने युद्ध-सम्बन्धी सम्पूर्ण वृत्तान्त
भगवान् शिव तथा माता पार्वतीको निवेदित किया और
बताया कि दैत्यराज सिन्धुकी समस्त सेना मारी जा चुकी
है और दैत्य सिन्धुके दोनों बलवान् पुत्र-धर्म तथा
अधर्म भी मारे जा चुके हैं ॥ ३७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'धर्म, अधर्म और असुरसेनाके संहारका वर्णन' नामक
एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११९ ॥