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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 656 में से

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पृष्ठ 51

उ०ख०-अ०४ ] * सोमकान्तका वनगमन * ४९
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राज्यका मूल (आधार) कही जाती है। राजा कामादि | विद्याधीश नामक मन्त्रियोंको बुलवाया और शुभ मुहूर्त
छः शत्रुओं* (काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह तथा | देखकर [राज्याभिषेकके लिये आवश्यक] सामग्रियोंका
मत्सर)-को जीतकर तत्पश्चात् अन्य शत्रुओंपर विजय | संकलनकर अनेक स्थानोंसे वेदके विद्वान्, यज्ञकर्ममें
प्राप्त करे ॥ ३७ ॥ | निष्णात ब्राह्मणों, महान् राजाओं, महारानियों, अपने
श्रेष्ठ राजा कभी किसीकी आजीविकाका उच्छेद, | सुहृज्जनों, सभी वर्गोंके प्रमुख लोगों और श्रेष्ठ नागरिकोंको
प्रजाका विनाश, देवसम्पत्तिका हरण, वन-उपवनोंका | शत्रुओंका नाश करनेवाले अपने पुत्रके राज्याभिषेक-
विनाश तथा देवालयों और स्मारकोंका ध्वंस न करे ॥ ३८ ॥ | समारोहका अवलोकन करनेके लिये आमन्त्रित
पर्वकालमें दान दे, यशके लिये त्याग करे, मित्रके | किया ॥ ४२-४५ १/२ ॥
साथ छल न करे और गोपनीय विषयका कथन स्त्रियोंसे | तदनन्तर गणेशजीका और इष्टदेवताका यथाविधि
न करे ॥ ३९ ॥ | पूजनकर मातृकाओंका पूजन और स्वस्तिवाचन करवाकर
ब्राह्मणका ऋणसे और गायका कीचड़से सम्यक् | आभ्युदयिक श्राद्धकर और ब्राह्मणोंको भोजनादिसे सन्तुष्टकर
रूपसे उद्धार करे। कभी असत्य न बोले और कभी | उन राजा सोमकान्तने वेदमन्त्रोंके उद्घोषके साथ पुत्र
सत्यको न छोड़े ॥ ४० ॥ | हेमकण्ठका राज्याभिषेक करवाकर अपने तीन प्रमुख
मन्त्रियों, प्रजा और सेवकोंके चित्तका हरण करनेवाला | मन्त्रियोंसे इस प्रकार कहा- ॥ ४६-४८ ॥
बने और सदा ब्राह्मणों एवं देवताओंको नमस्कार | राजा बोले- हे मन्त्रियो ! मैं अपने इस पुत्रको
करे ॥ ४१ ॥ | आप लोगोंके हाथमें सौंपता हूँ। 'यह मेरा ही पुत्र है'—
सूतजी बोले- इस प्रकार राजाने जैसे स्वयं | इस प्रकारकी बुद्धि आप लोगोंकी [मेरे इस पुत्रमें सदा]
[परम्परासे] सुना था, वैसे ही धर्मशास्त्रके साथ | रहे। नीतिनिपुण आपलोगोंने जैसे मेरी आज्ञाओंका पालन
आचार, नीतिशास्त्र एवं अन्य उपयोगी विषयोंकी शिक्षा | किया है, वैसे ही सभी वर्गोंके प्रमुखजनोंके साथ मिलकर
अपने पुत्र हेमकण्ठको देकर क्षेमंकर, रूपवान् और | इसके भी राज्य-संचालनमें सहयोग दें ॥ ४९-५० ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'आचारादिनिरूपण' नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥
चौथा अध्याय
सोमकान्तका वनगमन
सूतजी बोले- राज्याभिषेक सम्पन्न होनेपर उन | धन दिया ॥ २-४ ॥
राजा सोमकान्तने ब्राह्मणोंका पूजन किया और उन्हें | तदनन्तर पूर्वजन्मार्जित दोषोंके कारण दुःख और
अंगभूत दक्षिणाके साथ दस सहस्र गौएँ तथा मणि, मोती | शोकसे युक्त राजा सोमकान्तने अत्यन्त मलिन और
और मूँगे प्रदान किये। उन्होंने उन सबको हाथी, गौएँ, | अपवित्र अवस्थामें वनके लिये प्रस्थान किया ॥ ५ ॥
घोड़े, धन, रेशमी परिधान देकर सन्तुष्ट किया ॥ १ १/२ ॥ | उनके जाते ही लोगोंमें महान् हाहाकार मच गया।
उन्होंने राजाओं, राजपत्नियों, उनके सेवकों, ग्रामप्रमुखों | सब लोग अपना-अपना कार्य छोड़कर राजाके पीछे चल
तथा गुणीजनोंको यथायोग्य अनेक देशोंके सुवर्णजटित | दिये ॥ ६ ॥
वस्त्रों, कश्मीर देशमें निर्मित अनेक रंगोंके श्रेष्ठ वस्त्रोंको | मन्त्रिगण, राजाकी पत्नी सुधर्मा, पुत्र हेमकण्ठ तथा
प्रदान किया। साथ ही मन्त्रियोंको अन्य अर्थात् पूर्वमें | सुहृद्गण भी उठते, गिरते, लुढ़कते, दौड़ते और रोते हुए
दिये गये ग्रामोंके अतिरिक्त अनेक ग्राम और बहुत-सा | उनके पीछे गये ॥ ७ ॥

  • कामः क्रोधस्तथा लोभो मदमोहौ च मत्सरः । (किराता० १।९ पर मल्लिनाथकृत घण्टापथ टीका)