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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 486, कुल 656 में से

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पृष्ठ 486

४८४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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इक्यानबेवाँ अध्याय
बालक गुणेशद्वारा कूट तथा मत्स्य आदि रूप धारण
करनेवाले दैत्योंके वधकी लीला-कथा
ब्रह्माजी बोले—गुणेशके दूसरे वर्षकी अवस्थाकी | देखनेमात्रसे मरे हुए उस कूट नामक दैत्यको भूमिपर
बात है, बालक गुणेश असंख्य बालकोंके साथ वाटिकामें | गिरा दिया॥ ९-१०॥
क्रीड़ा कर रहे थे, वह वाटिका विविध प्रकारके वृक्षों | उस दैत्यके गिरनेसे पाँच योजन विस्तारवाली वह
तथा लताओंसे व्याप्त थी॥ १॥ | वाटिका चूर-चूर हो गयी। यह दृश्य वहाँ उपस्थित सभी
वे गुणेश खजूर तथा कटहलके फलोंको स्वयं खा | नगरवासियोंने देखा। कुछ लोग भयभीत होकर भाग गये
भी रहे थे और बलशाली होनेसे बहुत-से फलोंको | थे। बालक गुणेशने सभी जलचर जीवोंको जिला दिया
गिराकर उन बालकोंको भी दे रहे थे॥ २॥ | और उस सरोवरको विषसे रहित कर दिया। सभी
उसी समय कूट नामक एक महान् दैत्य उन | नगरनिवासी अपने-अपने बालकोंको लेकर अपने-अपने
बालकोंके पानी पीनेका समय जानकर वहाँ आया। वह | घर चले आये॥ ११-१२॥
दैत्य अत्यन्त दुष्ट, कपटी एवं मायावी था। उस दुर्बुद्धि | सभीने पार्वतीके पुत्र उन गुणेशकी प्रशंसा की,
दैत्यने उन सब बालकोंको मारनेकी इच्छासे सरोवरके | किंतु जो नास्तिक और दुष्ट थे, वे उनकी निन्दा
जलमें ऐसी विषराशिको हिलाकर मिला दिया, कि | करने लगे। कुछ दूसरे लोग कहने लगे कि इसके
जिसके स्पर्श करनेमात्रसे प्राणी क्षणभरमें मर जाते थे | साथ होनेसे सभी अरिष्ट विनष्ट हो जाते हैं। तदनन्तर
और जिन विषोंसे उठी हुई वायुसे आकाशचारी पक्षी | तीसरे वर्षकी बात है, एक दिन प्रातःकालके समय
भूमिपर गिर पड़ते थे। कुछ समय बीतनेके बाद कूट | पार्वतीपुत्र गुणेश सबकी नजरोंसे बचते हुए बाहर
नामक वह दैत्य उन बालकोंकी मृत्युको देखनेकी | चले गये, मुनियोंके बालक भी उनके पीछे-पीछे
इच्छासे वहाँ जाकर प्रतीक्षा करने लगा॥ ३-५॥ | निकल गये॥ १३-१४॥
तदनन्तर वे बालक, जिन्हें पता नहीं था कि जलमें | एक रात-दिनतक अलग-अलग रहनेके बाद जब
विष मिला हुआ है, जल पीनेके लिये वहाँ गये, वहाँ | वे पुनः परस्पर मिले तो एक-दूसरेको गले लगा लिया,
उनमेंसे किसीने चुल्लूसे तथा किसीने अंजलिमें जल | उन्होंने गुणेशसे कहा—हे देव! हम सभी सर्वदा आपको
लेकर पिया॥ ६॥ | रात्रिमें स्वप्नमें देखा करते हैं। हे प्रभो! आपको देखे
जलमें मरी हुई मछलियोंको लेकर वे बालक जब | बिना हमें एक रात्रिका समय एक युगके समान प्रतीत
बाहर आये तो विषपान करनेसे स्वयं भी मर गये। यह | होता है। इस समय आपका दर्शन करके हम सभी बहुत
देखकर रक्षकने गाँवमें जाकर बालकोंकी मृत्युका समाचार | प्रसन्न हो गये हैं॥ १५-१६॥
उच्च स्वरमें सुनाया॥ ७॥ | हे महासत्त्वसम्पन्न गुणेश! आज हम सब लोग दो
तब महान् हाहाकार करते हुए सभी नागरिक वहाँ | दल बनाकर सुखपूर्वक क्रीड़ा करते हैं। तदनन्तर आधे
आये। वे अपने हाथोंसे अपनी छाती पीट रहे थे और | बालक एक ओर हो गये और शेष आधे बालक दूसरी
कुछ पत्थरोंसे अपना सिर पीट रहे थे॥ ८॥ | ओर। तब कीचड़से गोले बनाकर उनसे वे बालक पृथ्वी
उस समय पुरुषों तथा स्त्रियोंका महान् कोलाहल | और आकाशको निनादित करते हुए एक-दूसरेपर प्रहार
व्याप्त हो गया। उन सभीके क्रन्दनको सुनकर पार्वतीपुत्रने | करने लगे। वे आह्लादपूर्वक इस प्रकार युद्ध करते हुए
भी अपने दृष्टिपातके द्वारा पुरमें रहनेवाले उन सभी | परस्पर एक-दूसरेको खींचने लगे॥ १७-१८॥
बालकोंको जीवित कर दिया और अपनी क्रूर दृष्टिद्वारा | इस प्रकार आनन्दपूर्वक क्रीड़ा करते हुए दूर एक