Skip to content
SarvaKosh
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

by गोस्वामी तुलसीदास

DevanagariHindipublished196 pages

Page 36 of 196

Read in context
Page 36

१२ दोहावली
तुलसी परिहरि हरि हरहि पाँवर पूजहिं भूत ।
अंत फजीहत होहिँगे गनिका के से पूत ॥६५॥
भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीहरि (भगवान् विष्णु)
और श्रीशंकरजीको छोड़कर जो पामर भूतोंकी पूजा करते हैं, वेश्याके
पुत्रोंकी तरह उनकी अन्तमें बड़ी दुर्दशा होगी ॥६५॥
सेये सीता राम नहिं भजे न संकर गौरि ।
जनम गँवायो बादिहीं परत पराई पौरि ॥६६॥
भावार्थ—यदि श्रीसीतारामजीकी सेवा नहीं की और
श्रीगौरीशंकरका भजन नहीं किया तो पराये दरवाजेपर पड़े रहकर
वृथा ही जन्म गँवाया ॥६६॥
तुलसी हरि अपमान तें होइ अकाज समाज ।
राज करत रज मिलि गए सदल सकुल कुरुराज ॥६७॥
भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीहरिका अपमान करनेसे
हानियोंका समाज जुट जाता है अर्थात् हानि-ही-हानि होती है।
[सन्धि करानेके लिये कौरवोंकी राजसभामें दूत बनकर गये हुए]
भगवान् श्रीकृष्णका अपमान करनेसे राज्य करते हुए कुरुराज
दुर्योधन अपनी सेना और कुटुम्बके सहित धूलमें मिल गये (नष्ट हो
गये) ॥ ६७ ॥
तुलसी रामहि परिहरें निपट हानि सुन ओझ ।
सुरसरि गत सोई सलिल सुरा सरिस गंगोज्झ ॥६८॥
भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि अरे पण्डित ! सुनो,
श्रीरामजीको छोड़ देनेसे अत्यन्त हानि होती है। श्रीगङ्गाजीका
वही जल श्रीगङ्गाजीसे अलग हो जानेपर मदिराके समान हो जाता