दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
by गोस्वामी तुलसीदास
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Read in context१४ दोहावली
राम-नाम-जपकी महिमा
चित्रकूट सब दिन बसत प्रभु सिय लखन समेत ।
राम नाम जप जापकहि तुलसी अभिमत देत ॥४॥
भावार्थ—श्रीसीताजी और श्रीलक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामजी
चित्रकूटमें सदा-सर्वदा निवास करते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि
वे राम-नामका जप जपनेवालेको इच्छित फल देते हैं ॥४॥
पय अहार* फल खाइ जपु राम नाम षट मास ।
सकल सुमंगल सिद्धि सब करतल तुलसीदास ॥५॥
भावार्थ—छः महीनेतक केवल दूधका आहार करके अथवा
फल खाकर राम-नामका जप करो। तुलसीदासजी कहते हैं कि ऐसा
करनेसे सब प्रकारके सुमङ्गल और सब सिद्धियाँ करतलगत हो
जायँगी (अर्थात अपने-आप ही मिल जायँगी) ॥५॥
राम नाम मनिदीप धरू जीह देहरीं द्वार ।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर ॥६॥
भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि तू भीतर और बाहर
दोनों ओर प्रकाश (लौकिक एवं पारमार्थिक ज्ञान) चाहता है तो
*किसी-किसी प्रतिमें 'पय अह्लाई' पाठ मिलता है; जिसका अर्थ होगा
'[चित्रकूटमें स्थित] पयस्विनी नदीमें स्नान करके'। 'पय अहार' और 'फल
खाइ' पाठ लेनेसे 'अहार' और 'खाइ' में जो द्विरुक्ति प्रतीत होती है, उसीके
निवारणके लिये सम्भवतः 'अहार' के स्थानमें 'अह्लाइ' संशोधन पीछेसे किया
गया है। किंतु इस प्रकारके प्रयोग गोस्वामीजीने अन्यत्र भी किये हैं—देखिये
रामचरितमानस अयोध्याकाण्डका दोहा १८८—
पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग ।
करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग ॥